BK Murli In Hindi 10 April 2016

Brahma Kumaris Murli In Hindi 10 April 2016

10-04-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज:27-03-81 मधुबन 

बाप पसन्द, लोक पसन्द, मन पसन्द कैसे बनें?


आज बापदादा विशेष किसलिए आये हैं? आज विशेष डबल विदेशी बच्चों से रूहरूहान करने के लिए आये हैं। लेन-देन करने के लिए आये हैं। दूर-दूर से सब बच्चे मधुबन में आये हैं तो मधुबन वाले बाप आये हुए बच्चों की खास ज्ञान के रूहरूहान की खातिरी करने आये हैं। आज बापदादा बच्चों से सुनने के लिए आये हैं कि किसी को भी किसी बात में कोई मुश्किल तो अनुभव नहीं होता। बाप और आपका मिलना भी सहज हो गया ना! जब मिलन सहज हुआ, परिचय सहज मिला, मार्ग सहज मिला, फिर भी कोई मुश्किल तो नहीं है! मुश्किल है नहीं लेकिन कोई ने मुश्किल बना तो नहीं दिया है। बाप द्वारा जो खजाना मिला है उनकी चाबी जब चाहो तब लगाओ, ऐसी विधि आ गई है। विधि है तो सिद्धि भी जरूर है। विधि में कमी है तो सिद्धि भी नहीं होती। क्या हाल चाल है? सब उड़ रहे हो? जब ऊंचे बाप के सिकीलधे बच्चे बन गये तो चलने की क्या जरूरत है! उड़ना ही है। रास्ते पर चलेंगे तो कहाँ बीच में रूकावट आ सकती है, लेकिन उड़ने में कोई रूकावट नहीं होती। सब उड़ते पंछी हैं। ज्ञान और योग के पंख सभी को अच्छी तरह से उड़ा रहे हैं। उड़ते-उड़ते थकावट तो नहीं होती? सबको `अथक भव' का वरदान मिल चुका है? बात भी बड़ी सहज ही है। अनुभव करना और अनुभव सुनाना। तो अनुभव सुनाना बहुत सहज होता है ना। अपनी ही बात सुनाते हो इसलिए है ही बहुत सहज। सम्बन्धों की बातें सुनाना इसमें मुश्किल क्या है! दो बातें सिर्फ सुनानी है। एक अपने परिवार की अर्थात् सम्बन्ध की बात और दूसरी प्राप्ति की बात इसलिए बापदादा सदा बच्चों को हर्षित ही देखते हैं। कभी सारे दिन में एकरस स्थिति के बजाए और रस आकर्षित तो नहीं करते हैं? एक रस हो गये हो? नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप हो गये? अब तो गीता का युग समाप्त होना चाहिए। ज्ञान की प्रालब्ध में आ गये ना सभी! स्मृति स्वरूप होना– यह है ज्ञान की प्रालब्ध। तो अब पुरूषार्थ समाप्त हुआ। जो वर्णन करते हो स्व स्वरूप का, वह सर्वगुण सदा अनुभव में रहते हैं ना। जब चाहो आनन्द स्वरूप हो जाओ, जब चाहो तब प्रेम स्वरूप हो जाओ। जो स्वरूप चाहो, जितना समय चाहो उसी स्वरूप में स्थित हो सकते हो? यह भी नहीं, हुए पड़े हो ना? बाप के गुण वहीं बच्चों के गुण। जो बाप का कर्तव्य वह बच्चों का कर्तव्य। जो बाप की स्टेज वह बच्चों की स्टेज– इसको कहा जाता है संगमयुगी प्रालब्ध। तो प्रालब्धी हो या पुरुषार्थी हो? प्राप्ति स्वरूप हो? प्राप्त करना है, होता नहीं है, कैसे होगा, यह भाषा बदल गई ना? आज धरनी पर कल आकाश में, ऐसे आते जाते तो नहीं हो ना? आज क्वेश्चन में कल फुलस्टाप में, ऐसे तो नहीं करते हो? एकरस अर्थात् एक ही सम्पन्न मूड में रहने वाला। मूड भी बदली न हो। बापदादा वतन से देखते हैं कई बच्चों के मूड बहुत बदलते हैं। कभी आश्चर्यवत की मूड, कभी क्वेश्चन मार्क की मूड, कभी कनफ्यूज की मूड। कभी टेन्शन, कभी अटेन्शन का झूला तो नहीं झूलते? मधुबन से प्रालब्धी स्वरूप में जाना है। बार-बार पुरूषार्थ कहाँ तक करते रहेंगे। जो बाप वह बच्चा। बाप की मूड आफ होती है क्या! अभी तो बाप समान बनना है। मास्टर हैं ना। मास्टर तो बड़ा होना चाहिए। कम्पलेन्टस् सब खत्म हुई? वास्तव में बात होती है छोटी। लेकिन सोच-सोचकर छोटी बात को बड़ा कर देते हो। सोचने की खातिरी से वह बात छोटी से मोटी बन जाती है। सोचने की खातिरी नहीं करो। यह क्यों आया, यह क्यों हुआ। पेपर आया है तो उसको करना है। पेपर क्यों आया, यह क्वेश्चन होता है क्या? वेस्ट और बेस्ट सेकेण्ड में जज करो और सेकेण्ड में उसको समाप्त करो। वेस्ट है तो आधाकल्प के लिए वेस्ट पेपर बाक्स में डाल दो। वेस्ट पेपर बाक्स बहुत बड़ा है। जज बनो, वकील नहीं बनो। वकील छोटे केस को भी लम्बा कर देते हैं। और जज सेकेण्ड में हाँ वा ना की जजमेंट कर देता है। वकील बनते हो तो काला कोट आ जाता है। है एक सेकेण्ड की जजमेंट, यह बाप का गुण है वा नहीं। नहीं है तो वेस्ट पेपर बाक्स में डाल दो। अगर बाप का गुण है तो बेस्ट के खाते में जमा करो। बापदादा का सैम्पुल तो सामने है ना। कापी करना अर्थात् फालो करना। कोई नया मार्ग नहीं बनाना है। कोई नई नॉलेज इन्वैन्ट नहीं करनी है। बाप जो सुनाता है वह स्वरूप बनना है। सब विदेशी 100 परसेन्ट प्रालब्ध पा रहे हो? संगमयुगी प्रालब्ध है– `बाप समान।' भविष्य प्रालब्ध है `देवता पद'। तो बाप समान बन बाप के साथ-साथ उसी स्टेज पर बैठने का कुछ समय तो अनुभव करेंगे ना। कोई भी राजा तख्त पर बैठते हैं, कुछ समय तो बैठेगा ना। ऐसे तो नहीं अभी-अभी बैठा और अभी-अभी उतरा। तो संगमयुग की प्रालब्ध है– बाप समान स्टेज अर्थात् सम्पन्न स्टेज के तख्तनशीन बनना। यह प्रालब्ध भी तो पानी है ना और बहुत समय पानी है। बहुत समय के संस्कार अभी भरने हैं। सम्पन्न जीवन है। सम्पन्न की सिर्फ कुछ घडियाँ नहीं हैं लेकिन जीवन है। फरिश्ता जीवन है, योगी जीवन है। सहज जीवन है। जीवन कुछ समय की होती है, अभी-अभी जन्मा, अभी-अभी गया– उसे जीवन नहीं कहेंगे। कहते हो पा लिया, तो क्या पा लिया? सिर्फ उतरना चढ़ना पा लिया? मेहनत पा लिया? प्रालब्ध को पा लिया? बाप समान जीवन को पा लिया? मेहनत कब तक करेंगे? आधाकल्प अनेक प्रकार की मेहनत की। गृहस्थ व्यवहार, भक्ति, समस्यायें, कितनी मेहनत की। संगमयुग तो है मुहब्बत का युग। मेहनत का युग नहीं, मिलन का युग है। शमा और परवाने के समाने का युग है। नाम मेहनत कहते हो लेकिन मेहनत है नहीं। बच्चा बनना मेहनत होती है क्या! वर्से में मिला है कि मेहनत में मिला है। बच्चा तो सिर का ताज होता है। घर का श्रृंगार होता है। बाप का बालक सो मालिक होता है। तो मालिक फिर नीचे क्यों आते? आपके नाम देखो कितने ऊंचे हैं? कितने श्रेष्ठ नाम हैं। तो नाम और काम एक है ना। सदा बाप के साथ श्रेष्ठ स्टेज पर रहो। असली स्थान तो वही है। अपना स्थान क्यों छोड़ते हो? असली स्थान को छोड़ना अर्थात् भिन्न-भिन्न बातों में भटकना। आराम से बैठो। नशे से बैठो। अधिकार से बैठो। नीचे आकर फिर कहते हो अब क्या करें। नीचे आते ही क्यों हो, जो फिर कोई बोझ अनुभव हो। बोझ अपने सिर पर नहीं रखो। जब मैं-पन आता है तो बोझ सिर पर आ जाता है। मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, करना पड़ता है। क्या आप करते हो? वा सिर्फ नाम आपका है, काम बाप का रहता है? उस दिन खिलौना देखा– वह खुद चल रहा था या कोई चला रहा था। साइन्स चला सकती है, तो क्या बाप नहीं चला सकता? यह तो बाप बच्चों का नाम बाला करने के लिए निमित्त बना देते हैं क्योंकि बाप इस नाम रूप से न्यारा है। जब बाप आपको आफर कर रहे हैं कि बोझ बाप को दे दो, आप सिर्फ नाचो, उड़ो फिर बोझ क्यों उठाते हो? कैसे सर्विस होगी, कैसे भाषण करेंगे.. यह तो क्वेश्चन ही नहीं। सिर्फ निमित्त समझ कनेक्शन पावर हाउस से जोड़कर बैठ जाओ। फिर देखो भाषण होता है वा नहीं! वह खिलौना चल सकता है, आपका मुख नहीं चल सकता! आपकी बुद्धि में प्लैन नहीं चल सकते। कैसे कहने से ही जैसे तार के ऊपर रबड़ आ जाता है। रबड़ आ जाने के कारण कनेक्शन जुटता नहीं और प्रत्यक्षफल नहीं दिखाई देता इसलिए थक जाते हो– पता नहीं क्या होगा! बाप ने निमित्त बनाया है तो अवश्य होगा। अगर कोई स्थान पर हैं ही 6-8 तो दूसरे स्थान से निकालो। दिलशिकस्त क्यों होते हो, चक्कर लगाओ। आसपास जाओ, चक्कर तो बहुत बड़ा है। कहाँ से 8 निकले, वह भी कम नहीं। फिर भी कोने में छिपे हुए को निकाला तो आपके कितने गुण गायेंगे। बाप के साथ निमित्त बनी हुई आत्मा को भी दिल से दुआयें तो देते हैं ना। कहाँ से एक रत्न भी निकला, एक के लिए भी जाना तो पड़ेगा ना। क्या उसको छोड़ देंगे! वह आत्मा वंचित रह जायेगी। जितने निकलें उतने निकालो, फिर आगे बढ़ो। अब तो विश्व के सिर्फ कोने तक पहुँचे हो। शिकार भी बहुत है, जंगल भी बहुत बड़ा है। सोचते क्यों हो? सोचने के कारण क्या होता? बुद्धि में व्यर्थ भर जाने के कारण टचिंग नहीं होती। परखने की शक्ति कार्य नहीं करती। जितना स्पष्ट होगा उतना जो जैसी चीज होगी, वह स्पष्ट दिखाई देगी। तो क्यों, क्या के कारण निर्णय शक्ति, टचिंग पावर कार्य नहीं करती। फिर थकावट होती है या दिलशिकस्त होते हैं। जहाँ भी गये हो वहाँ कोई न कोई छिपा हुआ रत्न निकला है तब तो पहुँचे हो ना। ऐसा तो कोई स्थान नहीं जहाँ से एक भी न निकला हो। कहाँ वारिस निकलेंगे, कहाँ प्रजा, कहाँ साहूकार, सब चाहिए ना। सब राजा तो नहीं बनेंगे। प्रजा भी चाहिए। प्रजा बनाने का यह कार्य निमित्त बने हुए बच्चों को ही करना है। या आप रॉयल फैमली बनायेंगे बाबा प्रजा बनायेंगे? दोनों ही बनाना है ना। सिर्फ दो बातें देखो– एक लाइन क्लीयर है? दूसरा मर्यादाओं की लकीर के अन्दर हैं? अगर दोनों बातें ठीक हैं तो कभी भी दिलशिकस्त नहीं होंगे। जिसका कनेक्शन ठीक है चाहे बाप से चाहे निमित्त बनने वालों से, वह कभी भी असफल नहीं हो सकता। सिर्फ बाप से ही कनेक्शन हो वह भी करेक्ट नहीं। परिवार से भी चाहिए क्योंकि बाप से तो शक्ति मिलेगी लेकिन सम्बन्ध में किसके आना है? सिर्फ बाप से? राजधानी अर्थात् परिवार से सम्पर्क में आना है। तीन सर्टिफिकेट लेने हैं। सिर्फ एक नहीं। एक– बाप पसन्द अर्थात् बाप का सर्टिफिकेट। दूसरा लोक पसन्द अर्थात् दैवी परिवार से सन्तुष्टता का सर्टिफिकेट। तीसरा मन पसन्द– अपने मन में भी सन्तुष्टता हो। अपने आप से भी मूंझा हुआ न हो। पता नहीं कर सकूंगा, चल सकूंगा.....। तो अपने मन पसन्द अर्थात् मन की सन्तुष्टता का सर्टिफिकेट। यह तीन सर्टिफिकेट चाहिए। त्रिमूर्ति हैं ना। तो यह त्रिमूर्ति सर्टिफिकेट चाहिए। दो से भी काम नहीं चलेगा। तीनों चाहिए। कोई समझते हैं– हम अपने से सन्तुष्ट हैं, बाप भी सन्तुष्ट है, चल जायेगा। लेकिन नहीं। जब बाप सन्तुष्ट है, आप भी सन्तुष्ट हो तो परिवार सन्तुष्ट न हो, यह हो नहीं सकता। परिवार को सन्तुष्ट करने के लिए सिर्फ छोटी सी एक बात है। ` रिगार्ड दो और रिगार्ड लो। ' यह रिकार्ड दिन रात चलता रहे। रिगार्ड का रिकार्ड निरन्तर चलता रहे। कोई कैसा भी हो लेकिन आप दाता बन देते जाओ। रिटर्न दे वा न दे लेकिन आप देते जाओ, इसमें निष्काम बनो। मैंने इतना दिया। उसने तो कुछ दिया नही। हमने सौ बार दिया, उसने एक बार भी नहीं। इसमें निष्काम बनो तो परिवार स्वत: ही सन्तुष्ट होंगे। आज नहीं तो कल। आपका देना जमा होता जायेगा, वह जमा हुआ फल जरूर देगा। और बाप पसन्द बनने के लिए क्या चाहिए? बाप तो बड़े भोले हैं। बाप जिसको भी देखते हैं सब अच्छे ते अच्छे हैं। `अच्छा नहीं' है, ऐसा तो कोई नजर ही नहीं आता। एक एक पाण्डव, एक एक शक्ति एक से एक आगे हैं। तो बाप पसन्द बनने के लिए– `सच्ची दिल पर साहेब राजी।' जो भी हो– सच्चाई, सत्यता बाप को जीत लेती है। और मन पसन्द बनने के लिए क्या चाहिए? मनमत पर नहीं चलना। मनपसन्द और चीज है। मन पसन्द बनने के लिए बहुत सहज साधन है– श्रीमत की लकीर के अन्दर रहो। संकल्प करो तो भी श्रीमत की लकीर के अन्दर। बोलो, कर्म करो जो कुछ भी करो लकीर के अन्दर। तो सदा स्वयं से भी सन्तुष्ट और सर्व को भी सन्तुष्ट कर सकेंगे। संकल्प रूपी नाखून भी बाहर न हो। बापदादा भी जानते हैं कि कितनी लगन है, कितना दृढ़ संकल्प है। सिर्फ बीच-बीच में थोड़े से नाजुक हो जाते हो। जब नाजुक बनते तो नखरे बहुत करते। प्यार ही इन्हों की टिकेट है तब पहुँचते हैं। प्यार न होता तो प्यार की टिकेट बिना यहाँ कैसे पहुंच सकते। यही टिकेट मधुबन निवासी बनाती। चारों ओर सेवा के लिए निमित्त बनाती। बापदादा ने आफरीन तो दी ना। जो वायदा करके गये वह निभाया। बाकी वृद्धि होती रहेगी। स्थापना तो कर ली ना। स्व उन्नति और सेवा की उन्नति– दोनों का बैलेन्स हो तो सदा वृद्धि होती रहेगी। यह भी एक विशेषता देखी। बहुत समय के इन्डिपेन्डेंट रहने वाले, अपने को संगठित रूप में चला रहे हैं। यह भी बहुत अच्छा परिवर्तन है। एक एक अलग रहने वाले 4-6 इकठ्ठे रहें और फिर संस्कार मिलाकर रहें– यह भी स्नेह का रिटर्न है। पाण्डव भवन, शक्ति भवन सफल रहे– यह भी विशेषता है। बाप-दादा इस रिटर्न को देख हर्षित होते हैं। एकनामी, एकानामी यह भी रिटर्न है ना। अपना शरीर निर्वाह और सेवा का निर्वाह दोनों में हाफ-हाफ कर (आधा-आधा करके) चलाना– यह भी अच्छी इन्वेंशन निकाली है। डबल कार्य हो गया ना। कमाया और लगाया– चाहे शरीर में चाहे सेवा में। लेकिन यहाँ कमाया और लगाया, यहाँ का बैंक बैलेन्स नहीं बनता लेकिन भविष्य जमा होता है। बुद्धि तो फ्री है ना? आया और लगाया, बेफिकर बादशाह। शक्तियों और पाण्डवों दोनों की रेस है। दीपक जगा और जगाने चल पड़ते। लक्ष्य बहुत अच्छा रखा है। भारत में हैन्डस निकालने की मेहनत करते और वहाँ बने बनाये हैन्डस सहज निकल आते हैं, यह भी वरदान है। पीछे आने वालों को यह लिफ्ट है। यहाँ वालों को बंधन काँटने में टाइम लगता और इन्हों का बंधन कटा कटाया है। तो लिफ्ट हो गई ना। सिर्फ मन का बन्धन नहीं हो। अच्छा।

वरदान:

सदा स्वमान में स्थित रह निर्माण स्थिति द्वारा सर्व को सम्मान देने वाले माननीय, पूज्यनीय भव   

जो बाप की महिमा है वही आपका स्वमान है, स्वमान में स्थित रहो तो निर्माण बन जायेंगे, फिर सर्व द्वारा स्वत: ही मान मिलता रहेगा। मान मांगने से नहीं मिलता लेकिन सम्मान देने से, स्वमान में स्थित होने से, मान का त्याग करने से सर्व के माननीय वा पूज्यनीय बनने का भाग्य प्राप्त हो जाता है क्योंकि सम्मान देना, देना नहीं लेना है।

स्लोगन:

जाननहार के साथ करनहार बन असमर्थ आत्माओं को अनुभूति का प्रसाद बांटते चलो।   



***OM SHANTI***

Google+ Followers