BK Murli Hindi 31 July 2016

Brahma Kumaris Murli Hindi 31 July 2016

31-07-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज:29-10-81 मधुबन

“बाप और बच्चों का रूहानी मिलन”

रूहानी बाप रूहानी बच्चों से मिलन मना रहे हैं। यह रूहानी मेला सिर्फ आप बच्चे ही मना सकते हो। एक बाप से एक ही समय यह मेला मना सकते हो। आप सभी दीवाली का मेला मनाने आये हो। मेले में एक होता है मनाना, दूसरा एक दो से मिलना, तीसरा कुछ लेना, कुछ देना, चौथा खेलना। आप सभी ने भी यह चार ही बातें की। मेले में तो आये लेकिन मनाना अर्थात् सदा अविनाशी उत्साह भरी, उमंग भरी जीवन में सदा रहने का दृढ़ संकल्प करना। यह रूहानी मेला मनाना, अविनाशी उत्सव मनाना, एक दो दिन के लिए नहीं, संगमयुग है ही सदा का उत्सव अर्थात् उत्साह बढ़ाने वाला। तो दिवाली गई नहीं लेकिन दिवाली है। नया वर्ष सदा के लिए है। हर घड़ी आपके लिए नई है। जैसे नये वर्ष में उसी दिन विशेष नये-नये वस्त्र, नया-नया श्रृंगार, नया उमंग और विशेष खुशी का दिन समझते हुए सबको बधाई देते हैं, मुख मीठा कराते हैं, वैसे आप रूहानी बच्चों के लिए संगमयुग का हर दिन सर्व को बधाई देने का है और सर्व का सदा के लिए मुख मीठा करने का है। ऐसे सदा उत्साह में रहना और औरों को भी उत्साह दिलाना। सदा मुख में मीठा बोल, यह है मुख मीठा होना और औरों को भी मीठे बोल द्वारा, मीठे बाप की स्मृति दिलाना, सम्बन्ध में लाना, यह है मीठा मुख कराना। तो सदा मुख मीठा है? मीठे बोल की मिठाई सदा आपके मुख में है और सदा औरों को खिलाते रहते हो। हर दिन श्रेष्ठ स्थिति अर्थात् हर दिन अपने में नवीनता धारण करते रहते हो। 

सेकेण्ड बीता और नई स्थिति। जो एक सेकेण्ड पहले स्थिति थी वह दूसरे सेकेण्ड चढ़ती कला की अनुभूति के कारण सदा श्रेष्ठ वा नई होती है। तो स्थिति धारण करना अर्थात् नये वस्त्र धारण करना। सतयुग में तो स्थूल में सदा नई ड्रेस पहनेंगे, विश्व महाराजन् वा राज्यवंशी पहनी हुई ड्रेस नहीं पहनेंगे। तो यह संस्कार यहाँ से राज्य-अधिकारी आत्माओं के भरते हैं। हर समय की नई स्थिति और हर समय बाप-दादा द्वारा ज्ञान, विज्ञान द्वारा नया श्रृंगार हो रहा है। जैसे सबसे ज्यादा सम्पत्तिवान, सदा नया-नया श्रृंगार करेंगे। तो सर्वश्रेष्ठ सम्पन्न बाप, आप श्रेष्ठ सम्पन्न बच्चों का रोज नया श्रृंगार करते हैं ना! तो रोज नया वर्ष हो गया ना! नये वस्त्र, नया श्रृंगार, नया उत्सव अर्थात् उत्साह और सदा मुख मीठा। निरन्तर ही मुख में मीठेपन की मिठाई इसलिए बाप भी रोज क्या बोलते हैं? (मीठे-मीठे बच्चे) यह तो पक्का याद है ना। बाप भी मीठे-मीठे बच्चे कहते और बच्चे भी क्या कहते? (मीठे-मीठे बाबा) तो मुख में क्या हो गया? तो रोज का नया वर्ष हो गया ना! नया वर्ष तो नया क्या नई घड़ी हो गई। तो इसी प्रकार मनाया? या उत्सव गया और उत्साह भी गया? ऐसा अल्पकाल का तो नहीं मनाया ना? यहाँ रूहानी मेला अर्थात् अविनाशी मेला, दूसरी बात मनाने के साथ मिलना। तो रूहानी मिलना वा मिलन करना अर्थात् मिलना अर्थात् बाप समान बनना। यह सिर्फ गले मिलन नहीं लेकिन गुणों से मिलन, संस्कारों से मिलन। 

मिलना अर्थात् समान बनना, इसीलिए ही संग के रंग का गायन है। ऐसे रूहानी मिलन मनाया? वा सिर्फ एक दो में हाथ मिलाया वा गले मिलाया? गुणों का मिलन वा संस्कारों का मिलन, यह तो सदाकाल का है ना? रोज मिलन मनाना है। तो चेक करो मेले में आये तो ऐसा मिलन मनाया? तीसरी बात– लेना और देना। लौकिक रीति से भी किसी मेले में जायेंगे तो पैसा देंगे और कोई चीज लेंगे। कुछ न कुछ लेते जरूर हैं। और लेने से पहले देना तो है ही। तो सदा लेते हो? एक दो में भी सदा हर एक की विशेषता वा गुणों को लेते ही हो। लेते हो ना सदा? जब लेते हो अर्थात् स्वयं में धारण करते हो। तो जब विशेषता धारण करेंगे तो उसके बदले साधारणता स्वत: ही खत्म हो जायेगी। गुण को धारण करते हो तो उस गुण के धारणा की कमजोरी स्वत: ही समाप्त हो जाती है। तो यही देना हो जाता है। तो गुजरात वालों ने लिया और दिया? लेना और देना किया? तो यह लेना और देना भी हर समय चलता ही रहता है और चलता ही रहेगा। हर सेकेण्ड लेते हो और देते हो क्योंकि लेने से देना बंधा हुआ है। तो देने में भी फ्राखदिल हो या कन्जूस हो? फ्राखदिल हो ना? और देते भी क्या हो? जिससे मजबूर हो वही चीज देते हो। बाप आते ही तब है जब सब बच्चे बिल्कुल खाली हो जाते हैं। न तन की शक्ति, न मन की, न धन की। तन की शक्ति से खाली– इसका यादगार शिव की बरात कैसी दिखाई है? और मन के शक्ति की समाप्ति की निशानी -“सदा की पुकार” की यादगार है। 

रोज पुकारते रहते हैं ना। धन से खाली की निशानी- अभी देखो जो थोड़ा बहुत सोना भी रहा है, उसके ऊपर भी सदा गवर्मेन्ट की आखँ है। डर-डर के पहनते हैं। अगर धन है भी तो नाम क्या है? “काला धन”। जितना बड़ा धनवान नाम का, उतना 90 परसेन्ट ब्लैकमनी होगी । तो नाम का धन रहा या काम का? तो जब सब तरफ से खाली हो जाते हो सिर्फ सुदामे के सूखे चावल रह जाते हैं तब बाप आते हैं। तो सूखे चावल खाने से तो नुकसान हो जायेगा। सिर्फ चावल देते हो वह भी सूखे और लेते क्या हो? सर्वगुण, सर्वशक्तियाँ, सर्व खजाने। 36 प्रकार से भी ज्यादा वैरायटी, तो लेना हुआ या देना हुआ? सूखे चावल भी मिट्टी वाले लाते हो। मिट्टी की ही स्मृति रहती है ना! अब तो बदल गये लेकिन जब बाप के पास आये तब मिट्टी वाले ही थे। मिट्टी को देखते, मिट्टी से खेलते और क्या करते थे! और अब रत्नों से खेलते हो। तो लेना और देना यह भी सदा चलता ही रहेगा। देने में भी हैं मिट्टी के सूखे चावल लेकिन फिर भी कई बच्चे देने में भी नाज-नखरे बहुत करते हैं। आज कहेंगे दे दिया लेकिन सुदामा के मिसल वह भी कच्छ (बगल) में छिपाकर रखते हैं। बाप तो ले सकते हैं लेकिन देने वाले का बनेगा? अगर खींच कर ले लेंगे तो देकरके लेना, उसमें कमी पड़ जायेगी। एक देना और पदम पाना। तो स्व-इच्छा अर्थात् दृढ़ संकल्प से एक देना पदम पाना इसलिए देना आपको ही पड़ेगा क्योंकि देने में ही कल्याण है। तो समझा लेना-देना क्या है! जब ऐसा मनाना, मिलना और लेना-देना हो जाता है फिर क्या होता है? सदा बाप के साथ खुशी में खेलना। 

सदा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलना। तो ऐसा मेला मनाया? यही रूहानी मेला सदा मनाते रहो। और हर रोज मेला है! समझा– अच्छा। ऐसे हर सेकेण्ड मेला मनाने वाले, सदा स्वयं का और सर्व का मुख मीठा करने वाले, सदा नया उत्साह रखने वाले अर्थात् सदा उत्सव मनाने वाले, हर सेकेण्ड चढ़ती कला की नई स्थिति अर्थात् नये वस्त्रधारी, नये श्रृंगारधारी, सदा बाप के साथ खुशी में खेलने वाले, ऐसे सदा रूहानी मेला मनाने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को बाप-दादा का यादप्यार और नमस्ते। युगलों से:- अपनी विशेषता को जानते हो? इस ग्रुप की विशेषता क्या है? यह ग्रुप सन्यासी, महात्माओं को भी नीचे झुकाने वाला है। सन्यासी अर्थात् आजकल की महान आत्मायें। तो आजकल के महात्मा कहलाने वालों को भी अपने जीवन द्वारा बाप का परिचय दिलाने वाले हो। इसी विशेषता को सदा स्मृति में रखते हुए हर कदम उठायेंगे तो हर कर्म चरित्र हो जायेगा। जैसे ब्रह्मा का हर कर्म चरित्र के रूप में वर्णन करते हो ना। यहाँ मधुबन में ब्रह्मा बाप की चरित्र भूमि समझकर आते हो ना। तो जैसे ब्रह्मा बाप का हर कर्म चरित्र बन गया क्योंकि श्रेष्ठ कर्म है, ऐसे इस ग्रुप की विशेषता है हर कर्म चरित्र समान करने वाले क्योंकि अभी अलौकिक बाप के बच्चे अलौविक हो गये। ब्रह्माकुमार, कुमारी का अलौकिक नाता हो गया। अलौकिक बाप, अलौकिक बच्चे और अलौकिक कर्म। अलौकिक कर्म को ही चरित्र कहेंगे। तो सारे दिन में अमृतवेले से लेकर रात तक हर कर्म चरित्र हो, साधारण नहीं, अलौकिक हो। अलौकिक जीवन वाले साधारण कर्म कर ही नहीं सकते। 

सभी की गाड़ी दो पहिये वाली ठीक चल रही है ना? कभी कोई पहिया नीचे ऊपर तो नहीं होता! एक पहिया आगे चले दूसरा पीछे ऐसे तो नहीं होता। आप सबकी यही विशेषता हो– जो एक दो से आगे भी रहो और एक दो को आगे करने वाले भी। एक दो को आगे रखना ही आगे होना है। ऐसे नहीं मैं पुरूष हूँ और वह समझे मैं शक्ति हूँ। अगर आप शक्ति हो तो वह पाण्डव भी कम नहीं, तो शक्तियाँ भी कम नहीं। दोनों ही बाप के सहयोगी हैं इसलिए पाण्डव आगे हैं या शक्तियां आगे हैं, यह भी नहीं कह सकते। शक्तियों को ढाल इसीलिए कहते हैं क्योंकि वह अपने को बहुत समय से नीचे समझती हैं, इसलिए नशा चढ़ाने के लिए आगे रखा है। शक्तियों को आगे रखने में ही पाण्डवों को फायदा है। शक्ति पीछे रहेगी तो आपको भी पीछे खींच लेगी क्योंकि शक्तियों में आकर्षण करने की शक्ति ज्यादा होती है इसलिए शक्तियों को आगे रखना ही आपका आगे होना है। वैसे भी शक्तियाँ पाण्डवों की ढाल हैं। पाण्डव कहीं ऐसा भाषण करें तो डण्डे खाने पड़े। वैसे भी गीता पाठशाला खोलते हो तो कहते हो बहन भेजो। माता गुरू है, इसलिए माता में भावना सहज बैठ जाती है। ब्रह्मा बाप भी बैकबोन रहा और शक्तियों को आगे किया तो आप भी ब्रह्मा की हमजिन्स हो। तो जैसे बाप ने शक्तियों को आगे किया तो सफलता मिली वैसे आप भी शक्तियों को आगे रखो तो सफलता मिल जायेगी। 

प्रवृत्ति में कोई खिटखिट तो नहीं होती? कभी बर्तन, बर्तन में लगकर ठका तो नहीं होता? क्योंकि कोई भी आवाज होगा तो क्या कहेंगे? भगवान के बच्चे और बर्तन, बर्तन से टकराता है! वैसे तो बर्तन, बर्तन में लगेगा तो आवाज जरूर होगा लेकिन यहाँ आवाज नहीं हो सकता, क्यों? क्योंकि यहाँ बीच में बाप है! जहाँ बीच में बाप आ गया वहाँ आवाज होगा? जब बीच से बाप को निकाल देते हो फिर टक्कर होता है, आवाज होता है। तो सदा बाप को साथ रखो। बाप साथ होगा तो कोई भी बात अगर हुई भी तो ठीक हो जायेगी। वैसे भी जब किसी दो की बात में, तीसरा बीच में पड़ता है तो बात खत्म हो जाती है ना। ऐसे ही बाप को बीच में रखेंगे तो बात बढ़ेगी नहीं, फैंसला हो जायेगा। प्रवृत्ति में रहते भी सदा देह के सम्बन्ध से निवृत रहो, तब ही पवित्र प्रवृत्ति का पार्ट बजा सकेंगे। मैं पुरूष हूँ, यह स्त्री है यह भान स्वप्न में भी नहीं आना चाहिए। आत्मा भाई-भाई है तो स्त्री पुरूष कहाँ से आये। युगल तो आप और बाप हो ना, फिर यह मेरी युगल है– ऐसा कैसे कह सकते? यह तो निमित्त मात्र सिर्फ सेवा अर्थ है, बाकी कम्बाइन्ड रूप तो आप और बाप हो। फिर भी बापदादा मुबारक देते हैं, हिम्मत पर। हिम्मत रख आगे चल रहे हो और चलते रहेंगे। इस हिम्मत की मुबारक देते हैं। 

कुमारों से:- 

अपने को सदा राजऋषि समझते हो? अधिकारी और ऋषि अर्थात् तपस्वी। स्व का राज्य प्राप्त होने से स्वत: ही तपस्वी बन जाते हैं क्योंकि जब स्व का राज्य होता है तो स्वयं को आत्मा समझने से बाप का बनने से, यही तपस्या हो जाती है। आत्मा बाप की बनी अर्थात् तपस्वी बनी। तो राज्य भी और ऋषि भी। तो सभी स्वराज्य अधिकारी बने हो? कोई भी कर्मेन्द्रिय अपने तरफ आकर्षित न करे, सदा बाप की तरफ आकर्षित रहें। किसी भी व्यक्ति व वस्तु की तरफ आकर्षण न जाये। ऐसे राज्य अधिकारी तपस्वी कुमार हो? बिल्कुल विजयी क्योंकि वायुमण्डल तो कलियुगी है ना और साथ भी हंस और बगुलों का है। ऐसे वातावरण में रहते हुए स्वराज्यधारी होंगे तब सेफ रहेंगे। जरा भी दुनिया के वायब्रेशन की आकर्षण न हो। कोई कम्पलेन नहीं, सदा कम्पलीट। कुमारों की कम्पलेन आती है। कुमार यदि विजयी बन जाएं तो सबसे महान हैं क्योंकि गवर्मेन्ट भी यूथ को आगे बढ़ाती है। उसमें भी कुमार ज्यादा होते हैं। कुमार जो चाहें वह कर सकते हें क्योंकि शक्ति बहुत होती है। लेकिन शक्ति को व्यर्थ तो नहीं गंवाते हो! संकल्प और स्वप्न में बाप के सिवाए और कोई नहीं तब कहेंगे नम्बरवन कुमार। कुमार निर्विघ्न हो गये तो सबको निर्विघ्न बना सकते हैं। कुमारों का टाइटल ही है विघ्न-विनाशक। किसी भी प्रकार का विघ्न– मंसा, चाहे वाचा, चाहे कर्मणा, किसी भी विघ्न के वशीभूत न हों इसलिए बच्चों का ही टाइटल है विघ्न-विनाशक। गणेश बच्चा है ना। तो आपके यादगार में विघ्न-विनाशक नाम प्रसिद्ध है। प्रैक्टिकल बने हो तब यादगार बना है। 

विघ्न-विनाशक बनने से स्वत: ही मंसा द्वारा भी सेवा होती रहेगी। वायुमण्डल भी निर्विघ्न बनता जायेगा। जैसे तत्वों से मौसम बदलती है वैसे विघ्न-विनाशक बच्चों से वायुमण्डल बदल जायेगा। तो चारों ओर विघ्न-विनाशक की लहर फैल जाए। सदा यही स्मृति में रखो कि हमें विजयी वायुमण्डल बनाना है। जैसे सूर्य स्वयं शक्तिशाली है तो चारों ओर अपनी शक्ति से प्रकाश फैलाता है, ऐसे ही शक्तिवान बनो। कुमारों को कोई न कोई काम जरूर चाहिए, कुमार अगर फ्री हुए तो खिटखिट हो जायेगी। कुमार बिजी रहे तो स्व का भी कल्याण, विश्व का भी कल्याण। तो विघ्न-विनाशक बन वायुमण्डल बनाने में बिजी रहो। अपनी विशेषता को इस कार्य में लगाओ। एक-एक कुमार अनेकों को संजीवनी बूटी देने वाले महावीर अर्थात् मूर्छित को सुरजीत करने वाले हो। तो सदा अपना यह आक्यूपेशन याद रखो। जैसे लौकिक आक्यूपेशन नहीं भूलता, ऐसे यह अलौकिक आक्यूपेशन भी सदा याद रहे। संगमयुग पर बाप द्वारा जो भी टाइटल मिले हैं उनकी स्मृति में रहो। टाइटल याद आने से स्वत: ही ज्ञान और ज्ञान दाता दोनों की याद आ जायेगी। अच्छा। 


वरदान:

अपने सम्पूर्ण स्वरूप के आह्वान द्वारा आवागमन के चक्र से छूटने वाले लक्की सितारे भव!   

अब अपनी सम्पूर्ण स्थिति व सम्पूर्ण स्वरूप का आह्वान करो तो वही स्वरूप सदा स्मृति में रहेगा फिर जो कभी ऊंची स्थिति, कभी नीची स्थिति में आने-जाने का (आवागमन का) चक्र चलता है, बार-बार स्मृति और विस्मृति के चक्र में आते हो, इस चक्र से मुक्त हो जायेंगे। वे लोग जन्म-मरण के चक्र से छूटने चाहते हैं और आप लोग व्यर्थ बातों से छूट चमकते हुए लक्की सितारे बन जाते हो।

स्लोगन:

किसी भी विघ्न के वश होना अर्थात् डायमण्ड पर दाग लगाना।   



***OM SHANTI***

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