BK Murli In Hindi 14 August 2016

Brahma Kumaris Murli In Hindi 14 August 2016

*14-08-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज:03-11-81 मधुबन*

*“योद्धा नहीं दिलतख्तनशीन बनो”*

*आज दूरदेश में रहने वाले परदेशी बाप अपने बच्चों से मिलने आये हैं। बच्चों को भी स्वदेश की स्मृति दिलाने आये हैं और समर्थ बनाए साथ ले जाने आये हैं। स्वदेश स्मृति में आ गया है ना? यह पराया देश और पराया राज्य है, जिसमें पुराना ही पुराना दिखाई देता है। व्यक्ति देखो वा वस्तु देखो सब क्या दिखाई देता है? सब जड़जड़ीभूत हो गये हैं। चारों ओर अंधकार छाया हुआ है। ऐसे देश में आप सभी बंधनों में बंधे हुए बन्धनयुक्त आत्मा बन गये तब बाप आकर स्वरूप और स्वदेश की स्मृति दे, बन्धन-मुक्त बनाए स्वदेश में ले जाते हैं। साथ-साथ स्वराज्य के अधिकारी बनाते हैं। तो सभी बच्चे अपने स्वदेश में जाने के लिए तैयार हो? वा जैसे आप लोग एक ड्रामा दिखाते हो, स्वर्ग में जाने के लिए चाहते हुए भी कोई विरला तैयार होता है। 


ऐसे ही बातें बनाकर “चलेंगे-चलेंगे” कहने वाले तो नहीं हो? हिसाब-किताब समाप्त कर लिया है वा अभी कुछ रहा हुआ है? अपने हिसाब-किताब के समाप्ति का समाप्ति समारोह मना लिया है वा अभी तक तैयारी ही कर रहे हो? ऐसे तो नहीं समझते हो कि अन्त में यह समाप्ति समारोह मनायेंगे? समाप्ति समारोह अब से मनायेंगे तब अन्त में सम्पूर्णता समारोह मनायेंगे। यह पुराना हिसाब-किताब समाप्त करना है। वह अब करने से बहुतकाल के बन्धनमुक्त, बहुतकाल के जीवनमुक्त पद को पा सकेंगे। नहीं तो अन्त तक युद्ध करने वाले योद्धा ही रह जायेंगे। जो अन्त तक योद्धा जीवन में रहता उसकी प्रालब्ध क्या होगी? योद्धा जीवन तो बचपन का जीवन है। अब तो स्वराज्य अधिकारी हो गये। स्मृति का तिलक, बाप के दिल-तख्तनशीन हो गये। तख्तनशीन योद्धे होते हैं क्या? युद्ध की प्रालब्ध तख्त और ताज मिल गया। क्या यह वर्तमान प्रालब्ध वा प्रत्यक्षफल प्राप्त नहीं हुआ है? संगमयुग की प्रालब्ध पा ली है वा पानी है? गीत क्या गाते हो? पाना था वह पा लिया वा पाना है? जबकि वर्तमान के साथ भविष्य का सम्बन्ध है, तो भविष्य प्रालब्ध 2500 वर्ष है तो क्या वर्तमान प्रालब्ध अन्त के 5-6 मास होगी वा 5 दिन होगी वा 5 घण्टे होगी वा संगम का बहुकाल होगा? अगर संगमयुग की प्रालब्ध बहुकाल नहीं होगी तो भविष्य प्रालब्ध बहुकाल कैसे होगी! 

वहाँ के 2500 वर्ष, यहाँ के 25 वर्ष भी नहीं होगी? डायरेक्ट बाप के बच्चे बन संगमयुग का सदाकाल का वर्सा नहीं पाया तो पाया ही क्या? सर्व खजानों की खानों के मालिक उसके बालक बन, खजानों से सम्पन्न नहीं बने तो मालिक के बालक बनकर क्या किया? “सफलता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।” यह कहते सदा सफलता का अनुभव नहीं किया तो जन्म सिद्ध अधिकारी बनके क्या किया? भाग्य विधाता के दोनों बाप के बच्चे बने फिर भी सदा पद्मापद्म भाग्यशाली न बने तो दो बाप के बच्चे बनके क्या किया? श्रेष्ठ कर्मों की वा श्रेष्ठ चरित्र बनाने की अति सहज विधि वरदाता बनके बाप ने दी फिर भी सिद्धि स्वरूप नहीं बने तो क्या किया? क्या युद्ध करना, मेहनत करना, धीरे-धीरे आराम से चलना– यही पसन्द है क्या? युद्ध का मैदान पसन्द आता है? दिलतख्त पसन्द नहीं है क्या? अगर तख्त ही पसन्द है, तो तख्तनशीन के पास माया आ नहीं सकती। तख्त से उतर युद्ध के मैदान में चले जाते हो तब मेहनत करनी पड़ती है। जैसे कई बच्चे होते हैं, लड़ने-झगड़ने के बिना रह नहीं सकते और कोई नहीं मिलेगा तो अपने से ही कोई-न-कोई कशमकश करते रहेंगे। युद्ध के संस्कार राज्य तख्त छुड़ाके भी युद्ध के मैदान में ले जाते हैं। अब युद्ध के संस्कार समाप्त करो। राज्य के संस्कार धारण करो, प्रालब्धी बनो तब बहुकाल के भविष्य प्रालब्धी भी बनेंगे। अन्त तक योद्धेपन की जीवन होगी तो क्या बनेंगे? चन्द्रवंशी बनना पड़ेगा। 


सूर्यवंशी की निशानी– सदा खुशी की रास करने वाले। सदा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने वाले। चन्द्रवंशी राम को कभी झूले में नहीं झुलाते हैं। रास नहीं दिखाते हैं। युद्ध का तीर कमान ही दिखाते हैं। पीछे का राज्य भाग्य मिलेगा। आधा समय का राज्य बहुकाल तो न्हीं हुआ ना! तो सदा झूले में झूलते रहो। सर्व से रास मिलाते हुए, खुशी की रास करते रहो। इसको कहा जाता है– संगमयुग की प्रालब्ध स्वरूप। पुरूषार्थी हैं, यह शब्द भी कहाँ तक? अभी-अभी पुरूषार्थी, अभी-अभी प्रालब्धी। संगम के पुरूषार्थी, सतयुग के प्रालब्धी नहीं। संगमयुग के प्रालब्धी बनना है। अभी-अभी बीज बोओ, अभी-अभी फल खाओ। जब साइंस वाले भी हर कार्य में प्राप्ति की गति को तीव्र बना रहे हैं, तो साइलेन्स की शक्ति वाले अपनी गति को उससे भी ज्यादा तीव्र करेंगे ना वा एक जन्म में करना और दूसरे जन्म में पाना? मधुबन वे लोग आवाज की गति से भी तेज जाना चाहते हैं। सब कार्य सेकेण्ड की गति से भी आगे करना चाहते हैं। इतने सारे विश्व का विनाश कितने थोड़े समय में करने के लिए तैयार हो गये हैं? तो स्थापना के निमित्त बनी हुई आत्मायें सेकेण्ड में करना, सेकेण्ड में पाना, ऐसी तीव्र गति के अनुभवी नहीं होंगे। तो समझा– अभी क्या करना है? प्रत्यक्षफल खाओ। 


प्रत्यक्षफल नहीं अच्छा लगता? मेहनत करने वाला फल अच्छा लगता है? मेहनत का सूखा फल खाके तो ऐसे कमजोर बन गये, नयनहीन, बुद्धिहीन, श्रेष्ठ कर्महीन बन गये। अब तो ताजा प्रत्यक्षफल खाओ। मेहनत को मुहब्बत में बदल दो। अच्छा। ऐसे सदा राज्य वंश के संस्कार वाले, सदा सर्व खजानों के अधिकारी अर्थात् बालक सो मालिक, सदा संगमयुगी प्रालब्धी संस्कार वाले, प्रत्यक्षफल खाने वाले, ऐसे सदा प्राप्ति स्वरूप, सदा सर्व बन्धनमुक्त, संगमयुगी जीवनमुक्त, ऐसे तख्त, ताजधारी बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते। *


*.पार्टियों के साथ पर्सनल मुलाकात:-* 


*1. सदा रूहानी नशे में स्थित रहते हो? रूहानी नशा अर्थात् आत्म-अभिमानी बनना। सदा चलते-फिरते आत्मा को देखना, यही है रूहानी नशा। रूहानी नशे में सदा सर्व प्राप्ति का अनुभव सहज ही होगा। जैसे स्थूल नशे वाले भी अपने को प्राप्तिवान समझते हैं, वैसे यह रूहानी नशे में रहने वाले सर्व प्राप्ति स्वरूप बन जाते हैं। इस नशे में रहने से सर्व प्रकार के दु:ख दूर हो जाते हैं। दु:ख और अशान्ति को विदाई हो जाती है। जब सदाकाल के लिए सुखदाता के, शान्तिदाता के बच्चे बन गये तो दु:ख अशान्ति को विदाई हो गई ना। अशान्ति का नामनिशान भी नहीं। शान्ति के सागर के बच्चे अशान्त कैसे हो सकते। रूहानी नशा अर्थात् दु:ख और अशान्ति की समाप्ति। उसकी विदाई का समारोह मना लिया? क्योंकि दु:ख अशान्ति की उत्पत्ति होती है अपवित्रता से। जहाँ अपवित्रता नहीं, वहाँ दु:ख अशान्ति कहाँ से आई। पतित-पावन बाप के बच्चे मास्टर पतित-पावन हो गये। जो औरों को पतित से पावन बनाने वाले हैं, वह स्वयं भी तो पावन होंगे ना। 


जो पावन पवित्र आत्मायें हैं, उनके पास सुख और शान्ति स्वत: ही है। तो पावन आत्मायें, श्रेष्ठ आत्मायें विशेष आत्मायें हो। विश्व में महान् आत्मायें हो क्योंकि बाप के बन गये। सबसे बड़े ते बड़ी महानता है पावन बनना इसलिए आज भी इसी महानता के आगे सिर झुकाते हैं। वह जड़ चित्र किसके हैं? अभी मन्दिर में जायेंगे तो क्या समझेंगे? किसकी पूजा हो रही है? स्मृति में आता है कि यह हमारे ही जड़ चित्र हैं। ऐसे अपने को महान् आत्मा समझकर चलो। ऐसे दिव्य दर्पण बनो जिसमें अनेक आत्माओं को अपनी असली सूरत दिखाई दे। *


*2. सदा चढ़ती कला में जा रहे हो? हर कदम में चढ़ती कला के अनुभवी। संकल्प, बोल, कर्म, सम्पर्क और सम्बन्ध सबमें सदा चढ़ती कला क्योंकि समय ही है चढ़ती कला का और कोई भी युग चढ़ती कला का नहीं है। संगमयुग ही चढ़ती कला का युग है, तो जैसा समय वैसा ही अनुभव होना चाहिए। जो सेकण्ड बीता उसके आगे का सेकण्ड आया, तो चढ़ती कला। ऐसे नहीं दो मास पहले जैसे थे वैसे ही अभी हो। हर समय परिवर्तन। लेकिन परिवर्तन भी चढ़ती कला का। किसी भी बात में रूकने वाले नहीं। चढ़ती कला वाले रूकते नहीं हैं, वे सदा औरों को भी चढ़ती कला में ले जाते हैं। *


*प्रश्न:- 

जो सदा उड़ते पंछी होंगे उनकी निशानी क्या होगी?*


*उत्तर:-

 वह चक्रवर्ती होंगे। आलराउण्ड पार्टधारी। उड़ती कला वाले ऐसे निर्बबन्धन होंगे जो जहाँ भी सेवा हो वहाँ पहुंच जायेंगे। और हर प्रकार की सेवा में सफलतामूर्त बन जायेंगे। जैसे बाप आलराउण्ड पार्टधारी है, सखा भी बन सकते तो बाप भी बन सकते, ऐसे उड़ती कला वाले जिस समय जो सेवा की आवश्यकता होगी उसमें सम्पन्न पार्ट बजा सकेंगे, इसको ही कहा जाता है– `आलराउण्ड उड़ता पंछी'। अच्छा! *


*प्रश्न:- साकार ब्रह्मा की अनेक भुजायें प्रसिद्ध क्यों हैं? यह किसका यादगार है? *


*उत्तर:-

 यह आप बच्चों के सहयोगी स्वरूप का यादगार है। जैसे शरीर के विशेष कार्यकर्ता भुजायें हैं, वैसे बापदादा के कर्तव्य में कार्यकर्ता निमित्त रूप में आप सब बच्चे हो। जो बच्चे सदा यथार्थ रूप में साथ निभाने वाले साथी व मददगार हैं उनको कहा जाता है– राइट हैण्ड। *

*प्रश्न:- 

राइट हैण्ड की विशेषता क्या है? *


*उत्तर:-

राइट हैण्ड सदा स्वच्छ अर्थात् शुद्ध और श्रेष्ठ है। जैसे कोई भी श्रेष्ठ व शुद्ध कार्य शरीर के राइट हैण्ड द्वारा ही किया जाता है, ऐसे बापदादा के सहयोगी राइट हैण्ड सदा बोल में, कर्म में और सम्पर्क में श्रेष्ठ और शुद्ध अर्थात् प्योर रहते हैं। 2- जैसे भुजाओं द्वारा कार्य कराने वाली शक्ति आत्मा है, भुजायें करनहार हैं और आत्मा करावनहार है, ऐसे ही राइट हैण्ड सहयोगी सदैव अपने करावनहार बाप को स्मृति में रखते हुए निमित्त करनहार बनते हैं। स्वयं को करावनहार नहीं समझते, इसीलिये उनके हर कर्म में न्यारेपन, निरहंकारीपन और नम्रतापन के नव-निर्माण की श्रेष्ठता भरी हुई होती है। 3- राइट हैण्ड विशेष शक्तिशाली होते हैं। राइट हैण्ड सहयोगी आत्मा सदैव विश्व-कल्याण, विश्वपरिवर्त क के कार्य के जिम्मेवारी का बोझ सहज रीति से उठा सकते हैं। 4- उनके कार्य की गति में अर्थात् स्पीड में तीव्रता होती है। वे हर सबजेक्ट की धारणा में व प्रैक्टिकल स्वरूप को लाने में तीव्र पुरूषार्थी होंगे, सदा एवर-रेडी होंगे।* 


*लेफ्ट हैण्ड सहयोगी भुजाओं की निशानियां क्या होंगी? *


*उत्तर:- 

उनमें स्वच्छता के साथ-साथ अस्वच्छता अर्थात् संकल्प, वाणी और कर्म में कभी-कभी कुछ-न-कुछ अशुद्धि भी रह जाती है अर्थात् सम्पूर्ण स्वच्छ नहीं होते। 2- उनके पुरूषार्थ की गति में तीव्रता कम रहती है। करेंगे, सोचेंगे, लेकिन लेफ्ट अर्थात् लेट करेंगे। साथ देंगे, कार्य करेंगे, लेकिन पूरी जिम्मेदारी उठाने की हिम्मत नहीं रखेंगे। सदा उल्लास, हिम्मत रखेंगे, लेकिन निराधार नहीं होंगे। *


*3-उनकी स्टेज बहुत समय वकील अर्थात् लॉयर की होती है। कायदे ज्यादा सोचेंगे लेकिन फायदा कम पायेंगे। स्वयं, स्वयं के जस्टिस नहीं बन सकेंगे। हर छोटी बात में भी फाइनल जजमेन्ट के लिये जस्टिस की आवश्यकता अनुभव करेंगे। तो अब अपने को चेक करो कि राइट हैण्ड हैं या लेफ्ट हैण्ड? *


*प्रश्न:- सभी बच्चों के दिल में जो विश्व परिवर्तन का शुभ संकल्प है, वह संकल्प पूरा कब होगा? *


*उत्तर:- 

जब स्वयं का सम्पूर्ण परिवर्तन करेंगे। जितना स्वयं के परिवर्तन में कमी होगी उतना ही विश्व-परिवर्तन की गति कम होगी। स्वयं के परिवर्तन से ही समय का परिवर्तन कर सकेंगे। स्वयं को देखो तो समय का मालूम स्वत: ही पड़ जायेगा क्योंकि परिवर्तन के समय की घड़ी आप हो। विश्व का अर्थात् सर्व आत्माओं का अटेन्शन, अब आप निमित्त बनी हुई समय की घड़ी पर है कि अब और कितना समय रहा हुआ है। *


*वरदान:*

*मनन शक्ति द्वारा शक्तिशाली बन विघ्नों के फोर्स को समाप्त करने वाले सर्व आकर्षण मुक्त भव!   *


*वर्तमान समय मनन शक्ति द्वारा आत्मा में सर्व शक्तियां भरने की आवश्यकता है। इसके लिए अन्तर्मुखी बन हर प्वाइंट पर मनन करो तो मक्खन निकलेगा और शक्तिशाली बन जायेंगे। ऐसी शक्तिशाली आत्मायें अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति का अनुभव करती हैं, उन्हें अल्पकाल की कोई भी वस्तु अपने तरफ आकर्षित नहीं कर सकती। उनकी मगन अवस्था द्वारा जो रूहानियत की शक्तिशाली स्थिति बनती है उससे विघ्नों का फोर्स समाप्त हो जाता है।*


*स्लोगन:*


*ब्राह्मण संसार में सर्व का सम्मान प्राप्त करने वाले ही तख्तनशीन बनते हैं।   *


🌝***Om Shanti***

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