BK Murli Hindi 6 November 2016

Brahma Kumaris Murli Hindi 6 November 2016 

06-11-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ’अव्यक्त-बापदादा“ रिवाइज:28-11-81 मधुबन

आप पूर्वजों से सर्व आत्माओं की आशाएं

आज ग्रेट ग्रेट ग्रैन्ड फादर अपनी सारी वंशावली से मिल रहे हैं। कितनी बड़ी वंशावली है, इसको आप सब जानते हो। आप सभी इस वंशावली के आदि फाउन्डेशन हो वा वंशावली के वृक्ष के मूल तना हो। आप लोगों द्वारा वंशावली कैसे वृद्धि को पाती है, यह सब राज अच्छी तरह से जानते हो ना? किसी भी आत्मा को देखते हो वा सम्पर्क में आते हो तो यह स्मृति में आता है कि सर्व आत्माओं के हम पूर्वज हैं वा सारे वृक्ष की शाखायें, उपशाखायें, सबके मूल आधार हैं अर्थात् फाउन्डेशन हैं। यह स्मृति सदा इमर्ज रूप में रहती है? इस श्रेष्ठ स्मृति से स्वत: ही समर्थ स्वरूप हो ही जायेंगे। अगर तना अर्थात् मूल फाउन्डेशन कमजोर होता है तो सारा वृक्ष कमजोर बन जाता है। तना शक्तिशाली है तो वृक्ष भी शक्तिशाली है। सारे वृक्ष के हर पत्ते का सम्बन्ध बीज के साथ-साथ तना से भी होता है। बीज की शक्ति तना द्वारा ही शाखाओं, उपशाखाओं को पहुंचती है। तो आज आपकी सर्व वंशावली को आप पूर्वजों द्वारा वा मूल आधार द्वारा कौन-सी शक्ति चाहिए? सर्व आत्मायें आप पूर्वजों को किस आशाओं से याद कर रहीं हैं? कौन-सी शुभ चाहना आप मास्टर दाता, वरदाताओं द्वारा चाहते हैं? सर्व आत्माओं की अर्थात् अपनी बेहद की वंशावली के शुभ संकल्प वा इच्छाओं को जानते हो? आज सर्व आत्माओं का एक ही आवाज सुनने में आ रहा है। सबका एक ही आवाज है– दो घड़ी के लिए भी सुख और चैन से जीना चाहते हैं। बेचैन हैं। सम्पत्ति और साधन होते हुए भी सुख और चैन की नींद आंखों में नहीं है। आजकल मैजारिटी सच्चे सुख और शान्ति के वा सच्ची खुशी के प्यासे होने के कारण रास्ता ढूंढ रहे हैं। अनेक अल्पकाल के रास्ते अनुभव करते, सन्तुष्टता न मिलने के कारण अब धीरे-धीरे उन अनेक रास्तों से लौट रहे हैं, यह भी नहीं, यह भी नहीं। अब नेती-नेती के अनुभव में आ रहे हैं। अभी, “सही रास्ता कुछ और है”, ऐसी अनुभूति करने लगे हैं। ऐसे समय पर आप पूर्वजों का कार्य है– ऐसी आत्माओं को शमा बन रास्ता दिखाना। अमर ज्योति बन अंधकार से ठिकाने पर लाना। 

ऐसे संकल्प आते हैं? यह स्मृति रहती है कि हम पूर्वज आत्मायें सर्व वंशावली के आगे जो करेंगे वो ही सारे वंशावली तक पहुंचता है? आप पूर्वजों की वृत्ति विश्व के वातावरण को परिवर्तन करने वाली है। आप पूर्वजों की दृष्टि सर्व वंशावल् को ब्रदरहुड की स्मृति दिलाने वाली है। आप पूर्वजों की बाप की स्मृति, सर्व वंशावली को स्मृति दिलायेगी कि हमारा बाप आया है। आप पूर्वजों के श्रेष्ठ कर्म वंशावली को श्रेष्ठ चरित्र अर्थात् चरित्र निर्माण की शुभ आशा उत्पन्न करेंगे। सबकी नजर आप पूर्वजों को ढूंढ रही है। अब बेहद के स्मृति स्वरूप बनो, तो हद की व्यर्थ बातें स्वत: ही समाप्त हो जायेंगी। उल्टे वृक्ष के हिसाब से बीज के साथ तना भी ऊपर ऊंचा है। डायरेक्ट बीज और मुख्य दो पत्ते, त्रिमूर्ति के साथ समीप के सम्बन्ध वाले तना हो। कितनी ऊंची स्टेज हो गई। इसी ऊंची स्टेज पर स्थित रहो तो हद की बातें क्या अनुभव होंगी! बचपन के अलबेलेपन की बातें अनुभव होंगी। अपने बेहद के बुजुर्गपन में आओ तो सदा सर्व अनुभवी मूर्त हो जायेंगे। जो बेहद के पूर्वज-पन का आक्युपेशन है, उसको सदा स्मृति में रखो। अब कितना कार्य रहा हुआ है? सदा यह स्मृति में रखो। लेकिन यह सारा कार्य सहज सम्पन्न कैसे होगा? जैसे आपकी रचना साइंस वाले विस्तार को सार में समा रहे हैं। अति सूक्ष्म और शक्तिशाली साधन बना रहे हैं। जिससे समय, सम्पत्ति और शस्त्र कम से कम खर्च हो। पहले विनाश के कार्य में कितनी बड़ी सेना, कितने शस्त्र और कितना समय लगता था। और अब विस्तार को सार में लाया है ना! ऐसे आप मास्टर रचयिता बन स्थापना के कार्य में ऐसे ही सूक्ष्म द्वारा निमित्त स्थूल साधन कार्य में लगाओ। नहीं तो स्थूल साधनों के विस्तार में सूक्ष्म शक्ति गुप्त हो जाती है। स्थूल साधन का विस्तार, जैसे वृक्ष का विस्तार बीज को छुपा देता है, वैसे सूक्ष्म शक्ति की परसेन्टेज गुप्त हो जाती है। आप पूर्वज आत्माओं की अलौकिकता-“सूक्ष्म शक्ति” है। जो सब अनुभव करें कि पूर्वजों द्वारा कोई विशेष शक्ति उत्पन्न हो रही है। वंशावली आप आत्माओं द्वारा कोई नवीनता चाहती है। साधनों की शक्ति, वाणी की शक्ति यह तो सबके पास है। लेकिन अप्राप्त शक्ति कौन-सी है? वह है श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति, शुभ वृत्ति की शक्ति। स्नेह और सहयोग की दृष्टि। यह किसके पास नहीं है। 

तो हे पूर्वज आत्मायें! अपनी वंशावली की प्राप्ति के, आशाओं के दीपक जलाए यथार्थ मंजिल तक लाओ। समझा क्या करना है? जो लोग करते हैं वह किया तो क्या किया। आप तो अल्लाह लोग हो, न्यारे लोग हो। अभी वाणी के बाम्बस फेंकते हो लेकिन यह अभी बेबी बाम्बस हैं। अभी प्राप्ति के अनुभूति के बाम्बस चलाओ, जो सीधा जीवन परिवर्तन कर दें। दिमाग तक तीर लगाये हैं, दिल का तीर नहीं लगाया है। आगे क्या करना है, वह प्लैन तो देना पड़ेगा ना। अभी मुख का आवाज निकलता है कि अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन दिल से आवाज निकले कि, “यही एक मार्ग है”। मुख का सौदा करने वाले बहुत होते हैं, दिल से सौदा करने वाले कोटों में कोई होते हैं। लेकिन आप सभी दिलवाला के बच्चे हो, दिल से सौदा कराने वाले हो। तो अब क्या करेंगे? ऐसा शक्तिशाली सेवा का चक्र चलाओ जो सर्व आत्मायें अपने पूर्वजों को पहचान प्राप्ति के अधिकार को प्राप्त कर लें। कुछ सुना, अच्छा सुना, इसके बदले, कुछ मिला– ऐसी अनुभूति करें। समझा? सुनाते अच्छा हैं, नहीं, बनाते अच्छा हैं। कम खर्च, कम शक्ति, कम समय– इसी विधि से सिद्धि स्वरूप बनो। पंजाब का जोन है ना? पंजाब को क्या बनायेंगे? ऐसी कुछ नवीनता करके दिखाओ– अनुभव कराना अर्थात् वारिस बनाना। अच्छा सुनने वाले, अच्छा-अच्छा कहने वाले, वह हो गई प्रजा। अब चाहिए वारिस क्वालिटी। एक वारिस के पीछे प्रजा तो आपेही भी आ जायेगी। पंजाब क्या करेगा? क्वान्टिटी नहीं बढ़ती तो क्वालिटी तो निकाल सकते हो। क्या करेंगे? अभी वारिस क्वालिटी चारों ओर कम है। तो पंजाब इसमें नम्बरवन हो जाओ। कोई क्वान्टिटी में नम्बरवन, तो कोई क्वालिटी में नम्बरवन हो जाओ। समझा– पंजाब वाले क्या करेंगे? क्वालिटी वाला एक और क्वान्टिटी कितनी होगी क्योंकि एक क्वालिटी वाला क्वान्टिटी को स्वत: ही ले आता है। उनके नाम से आपका काम हो जायेगा। यह तो सहज है ना? अच्छा। आज पंजाब और मधुबन का टर्न है। पंजाब वाले सबको मधुबन में आकर सरेन्डर करायेंगे। पंजाब से नदिया निकलेंगी और समायेंगी कहाँ? मधुबन है ही सागर का कण्ठा। 

तो पंजाब और मधुबन का मेल हो गया। विशेष टर्न पंजाब का है इसीलिए पंजाब को कह रहे हैं। बाकी तो उसमें सब आ गये। मधुबन में तो सब आ गये। सबको किसमें समाना है? मधुबन में ना! अच्छा। चारों ओर के सर्व पूर्वज आत्माओं को, सदा सर्व की आशायें सदाकाल के लिए पूर्ण करने वाले, अप्राप्त आत्माओं को प्राप्ति के अंचली की अनुभूति कराने वाले, सर्व को अनेक रास्तों से निकाल एक रास्ते पर लाने वाले, ऐसे सर्व आत्माओं के मूल आधार, सदा सर्व को एक बाप के अधिकारी बनाने वाले ऐसी श्रेष्ठ पूर्वज आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते। सुना तो बहुत है अब विशेषता है स्वरूप बन स्वरूप बनाना। जितना स्वयं सर्व प्राप्ति स्वरूप होंगे उतना सर्व को प्राप्ति स्वरूप बना सकेंगे। आजकल सर्व आत्मायें पाना चाहती हैं न कि सुनना। जब पा लेते हैं तब ही खुशी से यह गीत गायेंगे कि पाना था वो पा लिया। जैसे आप लोग यह खुशी का गीत गाते हो ना! पा लिया। ऐसे अन्य आत्मायें भी यह खुशी का गीत गायेंगी। वर्तमान समय आत्माओं को यही आवश्यकता है। जो आवश्यकता है उसी को पूर्ण करना, यही आप श्रेष्ठ आत्माओं का कर्तव्य है। इसी कर्तव्य में सदा अनुभवी मूर्त अनुभव कराते चलो। यही चाहते हैं ना, इसी चाहना को पूर्ण करने वाले अर्थात् सर्व को तृप्त आत्मा बनाने वाले। तो सदा तृप्त आत्मा हो? सदा सर्व खजानों से सम्पन्न। जो सम्पन्न होगा वही तृप्त होगा। और जो स्वयं के पास होगा वही औरों को भी जरूर देगा। तो सदा प्राप्ति स्वरूप के नशे और खुशी में रहो– यही संगमयुग के जीवन की विशेषता है। बाप को पाया अर्थात् संगमयुग का प्रत्यक्षफल पाया। प्रत्यक्षफल है सर्व प्राप्ति। इसी स्थिति से सर्व सिद्धियां प्राप्त हो जायेंगी। मधुबन निवासी भाई-बहिनों के साथ:- मधुबन निवासी इतने खुशनसीब हो जो सब देखकर खुश हो रहे हैं। इतनी अपनी तकदीर को जानते हो ना! कितने तकदीरवान हो जो सदा सागर के कण्ठे पर रहते हो। सदा स्थूल में भी बाप और श्रेष्ठ आत्माओं का साथ है तो कितना बड़ा भाग्य हो गया! तो सदा अपने भाग्य के गुण गाते रहते हो? बस यही गुण गाते और खुशी के झूले में झूलते रहो। मधुबन निवासी अर्थात् सदा मधु के समान मीठे। 

तो सदा मुख मीठा रहना और सदा सर्व का मुख मीठा करने वाले। सागर के कण्ठे पर रहने वाले होलीहंस हो। हंस क्या करते हैं? सदा मोती चुगते हैं। कंकड़ को देखते नहीं, रत्नों को देखते हैं। तो सभी रत्नों को ग्रहण करने वाले हो ना! महान तीर्थ स्थान पर रहने वाली महान आत्मायें हो। तो यह महात्माओं का ग्रुप हो गया ना! महात्मा अर्थात् जो सदा महान वस्तु को देखे। तो महान वस्तु कौन-सी है? (आत्मा) तो महात्मा की नजर कहाँ जायेगी? महान वस्तु पर। तो सदा महान देखने वाले, महान बोल बोलने वाले और महान कर्म करने वाले, इसको कहा जाता है महात्मा। तो पाण्डव सभी महात्मा हो! बापदादा की सबसे ज्यादा आशायें किसमें हैं? मधुबन निवासियों में। मधुबन वालों को आशाओं के दीपक जगाने आते हैं ना? तो सदा मधुबन में दीवाली है ना! सदा शुभ आशाओं के दीप जग रहे हैं तो रोज दीपावली हो गई। तो मधुबन में कभी अंधकार हो नहीं सकता। मधुबन वाले मास्टर शिक्षक हो। आप सिखाओ न सिखाओ लेकिन आपका हर कर्म हरेक आत्मा को शिक्षा देता रहता है। चाहे साधारण भी करेंगे तो भी सीखकर जाते हैं और श्रेष्ठ करते हो तो भी सीखकर जाते हैं। शिक्षा देते नहीं हो लेकिन मधुबन निवासी बनना अर्थात् मास्टर शिक्षक बनना। तो सदा याद रखो कि मैं मास्टर शिक्षक हूँ। तो हर कर्म, हर बोल शिक्षा देने वाला हो। आप लोगों को खास तख्त पर बैठकर सिखाने की जरूरत नहीं। चलते-फिरते शिक्षक हो। जैसे आजकल चलती-फिरती लाइब्रेरी होती है ना! तो आप चलते-फिरते मास्टर शिक्षक हो। आपका स्कूल अच्छा है ना! तो सदा अपने सामने स्टूडेन्ट को देखो, अकेले नहीं हो, सदा स्टूडेन्ट के सामने हो। सदा स्टडी कर भी रहे हो और करा भी रहे हो। योग्य शिक्षक कभी भी स्टूडेन्ट के आगे अलबेले नहीं होंगे, अटेन्शन रखेंगे। आप सोते हो, उठते हो, चलते हो, खाते हो, हर समय समझो– हम बड़े कालेज में बैठे हैं, स्टूडेन्ट देख रहे हैं, तो वन्डरफुल शिक्षक हो गये ना! आप सबकी क्या महिमा करें? मधुबन वालों की जो भी महिमा है वह सब है। ऐसे महान समझते हुए सदा चलो। बाप जितनी महिमा करेंगे उतनी फिर निभानी भी पड़ेगी। तो निभाने में भी होशियार हो ना! मधुबन का नक्शा सारे विश्व में चला जाता है। सबकी बुद्धि में सदा क्या याद रहता है? मधुबन में क्या हो रहा है। 

तो सर्व की बुद्धि में स्मृति स्वरूप हो। मधुबन निवासी हरेक लाइट, माइट का गोला बनो। तो लाइट और माइट के अन्दर स्वयं ही सभी आकर्षित होकर आयेंगे। अभी तो बाप का कर्तव्य चल रहा है, उसके कारण बाप के बनने वाले बच्चे सहज ही अनुभव कर रहे हैं और करते रहेंगे। आपका कर्तव्य अभी गुप्त है। आप अभी अपने शक्ति स्वरूप से वायुमण्डल बनाओ। यह तो ड्रामा अनुसार होना ही है, बढ़ना ही है, चलना ही है इसलिए चलाने वाला चला रहा है लेकिन अभी ऐसे ही फालो फादर करो। अभी हर आत्मा शक्ति स्वरूप हो जाए। जिसके भी सम्पर्क में आते हो वह अलौकिकता का अनुभव करे। अभी वह पार्ट चलना है। सुनाया ना अभी अच्छा-अच्छा कहते हैं, लेकिन अच्छा बनना है– यह प्ररेणा नहीं मिल रही है। उसका एक ही साधन है– संगठित रूप में ज्वाला स्वरूप बनो। एक-एक चैतन्य लाइट हाउस बनो। सेवाधारी हो, स्नेही हो, एक बल एक भरोसे वाले हो, यह तो सब ठीक है, लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज, स्टेज पर आ जाए तो सब आपके आगे परवाने के समान चक्र लगाने लग जाएं। अभी सिर्फ बाप शमा की आर्कषण है और सर्व शमा की आकर्षण हो जाए तो क्या होगा? शमा तो हो लेकिन अभी स्टेज पर नहीं आये हो। स्टेज पर आओ तो देखो आबू वाले कैसे आपके पीछे-पीछे दौड़ते हैं। आप लोगों को जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी वह स्वयं आकर कहेंगे जी हजूर, कोई सेवा! अभी लाडले बच्चे बने हो, इसमें तो ठीक, बच्चे और बाप के साथ लाडव्ड में, सम्बन्ध निभाने में ठीक हो लेकिन अब मास्टर शिक्षक बनकर, मास्टर सतगुरू बनकर स्टेज पर आओ। अभी यह दो पार्ट रहे हुए हैं। समझा– अच्छा। मधुबन निवासियों को बापदादा सदा विशेष आत्मा के रूप में देखते हैं। सदा बाप की आशाओं के दीपक मधुबन निवासी हैं। सभी सन्तुष्ट तो सदा हो ना? सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना यही आप सबका सदा का स्लोगन हो। सदा आपके बोर्ड पर कौन सा स्लोगन लिखा है? सन्तुष्ट रहना भी है और करना भी है। इसी सर्टिफिकेट वाले भविष्य में भी राज्य भाग्य का सर्टिफिकेट ले लेंगे। तो मधुबन वालों ने यह सर्टिफिकेट तो लिया है ना। सदा अमृतवेले इस स्लोगन को स्मृति में लाओ। जैसे बोर्ड पर स्लोगन लिखते हो वैसे सदा अपने मस्तक के बोर्ड पर यह स्लोगन दौड़ाओ। तो सभी सन्तुष्ट मूर्तियां हो जायेंगे। अच्छा।

वरदान:

परिवर्तन शक्ति द्वारा सर्व की शुक्रिया के पात्र बनने वाले विघ्न जीत भव

यदि आपका कोई अपकार करे तो आप एक सेकण्ड में अपकार को उपकार में परिवर्तित कर दो, कोई अपने संस्कार-स्वभाव के रूप में परीक्षा बनकर सामने आये तो आप एक की स्मृति से ऐसी आत्मा के प्रति भी रहमदिल के श्रेष्ठ संस्कार-स्वभाव धारण कर लो, कोई देहधारी दृष्टि से सामने आये तो उनकी दृष्टि को आत्मिक दृष्टि में परिवर्तित कर लो, ऐसे परिवर्तन करने की युक्ति आ जाए तो विघ्न जीत बन जायेंगे। फिर सम्पर्क में आने वाली सर्व आत्मायें आपका शुक्रिया मानेंगी।

स्लोगन:

अनुभवों का स्वरूप बन जाओ तो चेहरे से खुशनसीबी की झलक दिखाई देगी।



***OM SHANTI***

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