BK Murli Hindi 29 March 2017

Brahma Kumaris Murli Hindi 29 March 2017

29/03/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - भगवान, जिसे सारी दुनिया याद करती है, वह तुम्हारे सम्मुख बैठा है, तुम ऐसे बाप से पूरा वर्सा ले लो, भूलो मत”

प्रश्न:

बाप की श्रीमत पर यथार्थ चलने की शक्ति किन बच्चों में रहती है?

उत्तर:

जो अपना सच्चा-सच्चा पोतामेल बाप को सुनाकर हर कदम पर बाप से राय लेते हैं। बाप से राय ली तो उस पर चलने की शक्ति भी मिल जाती है। बाप बच्चों को श्रीमत देते हैं - बच्चे उस कमाई के पीछे यह कमाई मिस नहीं करो क्योंकि वह पाई-पैसे की सारी कमाई खत्म होने वाली है। हर बात में श्रीमत लेते बहुत खबरदार रहो, सम्भलकर चलना है। अपनी मत नहीं चलानी है।

गीत:-

छोड़ भी दे आकाश सिंहासन...  

ओम् शान्ति।

अभी बच्चे सम्मुख बैठे हैं, किसके? बेहद के बाप और दादा के। यह बड़ी वन्डरफुल चीज़ है। बेहद का बाप परमपिता परमात्मा और फिर बेहद का दादा प्रजापिता ब्रह्मा, दोनों सम्मुख बैठे हैं। किसके? बच्चों के। तो यह जैसे ईश्वरीय कुटुम्ब (परिवार) बैठा है और बेहद का बाप बैठ बच्चों को पढ़ा रहे हैं अथवा सहज राजयोग सिखला रहे हैं। यह बुद्धि में रहे तो खुशी का पारा भी चढ़े। गीत भी ऐसे कहते हैं कि बाबा आओ, इस समय बहुत दु:ख है। आह्वान करते रहते हैं और यहाँ तुम्हारे सम्मुख बैठे हैं। तुम जानते हो बेहद का बाप इस दादा द्वारा हमको पढ़ा रहे हैं। बच्चों में भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार बुद्धि में निश्चय है। बैरिस्टरी पढ़ते हैं तो जरूर निश्चय होगा ना - यह हमको बैरिस्टरी पढ़ाते हैं! फलाना सर्जन हमको सर्जरी सिखला रहे हैं। यह ऐसी वन्डरफुल चीज़ है कि अभी-अभी कहते हैं हमको पक्का निश्चय है, बेहद का बाप निराकार हमको पढ़ाते हैं, राजयोग सिखलाते हैं। अभी-अभी कहाँ बाहर दूर गये तो निश्चय टूट पड़ता। वन्डर है ना! भगवान जिसको सारी दुनिया याद करती, वही बच्चों के सम्मुख बैठ कहते हैं - बच्चे अब अच्छी रीति बाप से वर्सा लेने का पुरुषार्थ करो। समझते भी हैं फिर सेकेण्ड में भूल जाते हैं। तुम बेहद के बाप के सम्मुख बैठे हो और श्रीमत पर चलना होता है कदम-कदम पर। लेकिन चलेंगे वही जिनका सारा समाचार बाप को मालूम होगा। बच्चों की रहनी-करनी आदि का पूरा समाचार बाप के पास आना चाहिए। तो बाप को भी मालूम पड़े और उस रीति फिर समय प्रति समय राय देते रहें। कदम-कदम पर श्रीमत लेनी पड़े। यह है गॉड फादरली युनिवर्सिटी, इसमें अच्छी रीति पढ़ना है। ऐसे नहीं आज पढ़ा फिर कब कोई काम पड़ा तो पढ़ाई मिस कर दी। वह सब काम हैं पाई-पैसे के। इस दुनिया में मनुष्य जो भी कमाई करते हैं, वह कोई रहने वाली नहीं है। सब खत्म हो जाने वाली है। बाप कमाते हैं बच्चों के लिए। समझते हैं पुत्र पोत्रे, पर पोत्रे खाते रहेंगे। फिर बच्चा जब बाप बनेंगे तो वह अपने बच्चों के लिए कोशिश करेंगे। 

अब तो विनाश सामने खड़ा है। तो बाप को जब बच्चों के पोतामेल का मालूम पड़े तब तो मत दे। कदम-कदम पर पूछना पड़ता है। ऐसे नहीं कोई विकर्म हो जाए। यह है बेहद का घर। बाप ऐसे बैठ समझाते हैं - जैसे हूबहू हद के घर में लौकिक बाप समझाते हैं। सब बच्चे जानते हैं हम ब्राह्मण हैं। कोई से पूछो भगवान तुम्हारा क्या लगता है? तो कहेंगे वह तो सबका बाप है। फिर पूछो वह कहाँ रहते हैं? तो कह देंगे सर्वव्यापी है। बेहद के बाप को नहीं जानते। तुम बच्चे अभी बाप को यथार्थ रीति जानते हो तो तुम्हें दैवी मत पर चलना है। बाप आये हैं देवी-देवता बनाने के लिए। कदम-कदम श्रीमत पर चलना पड़े। पण्डे लोग यात्रा पर ले जाते हैं तो खबरदार करते रहते हैं, कहते हैं सम्भलकर चलो। ऐसे भी बहुत हैं जो तीर्थो आदि को नहीं मानते हैं। तीर्थ माना भक्ति। तीर्थ को न माना गोया भक्ति को ही नहीं माना। भक्ति मार्ग आधाकल्प चलता है। भगवान की खोज़ करते रहते हैं। बहुत भावना रखते हैं। शिव के आगे बहुत जाते हैं। समझते हैं भगवान का दीदार हो जाए, यह है भावना। फिर साक्षात्कार हो जाता है तो बहुत खुश हो जाते हैं। समझते हैं हमको भगवान मिल गया, कृष्ण मिल गया, हनुमान मिल गया। बस अब तो हमारी मुक्ति हो गई। परन्तु मुक्ति तो कोई की होती नहीं।


अब बाप अच्छी रीति बैठ समझाते हैं मीठे बच्चे अब एक तो सबको बाप का परिचय दो। इस समय सब निधन के हैं, तुम भी निधन के थे। अब बाप द्वारा तुम सब कुछ समझते जाते हो। कहते हैं ना - हम नीच पापी हैं। भला ऐसा नीच किसने बनाया? किसको भी मालूम नहीं है। कोई भी अपने को मूर्ख नहीं समझते हैं। यह ड्रामा अनादि बना हुआ है, सबको नीचे जाना ही है, भ्रष्टाचारी बनना ही है। तो यह ख्याल करना चाहिए कि हम भगवान की फैमली हैं। भगवान हमारा बाप है तो जरूर हम विश्व के मालिक होने चाहिए। फिर हमारी ऐसी दुर्गति क्यों हुई है? यह किसकी भी बुद्धि नहीं चलती है। एक तरफ कहते परमात्मा सर्वव्यापी है, दूसरे तरफ कहते शान्ति कैसे स्थापन हो! मूँझ पड़े हैं। कान्फ्रेन्स करते रहते हैं। समझाने से भी समझते नहीं हैं, उन्हों को समझना है अन्त में। तुम बच्चों को योग में रहकर कर्मातीत बनना है। तुम ही सम्पूर्ण निर्विकारी थे फिर बनना है। बाकी जो इतने धर्म हैं, वह सतयुग में नहीं होंगे। जो सतयुग में थे वही बहुत समय से अलग हुए हैं। उनके लिए ही कहा जाता है सिकीलधे। आत्मा परमात्मा अलग रहे.... कौन सी आत्मायें पहले-पहले परमधाम से आई यहाँ पार्ट बजाने! पहले-पहले आती हैं देवी-देवता धर्म की आत्मायें पार्ट बजाने। उन्हों को ही अपने धर्म में लाना होगा। बाप कहते हैं - उनके लिए ही आना पड़ता है। साथ में सबके लिए भी जरूर आना पड़े क्योंकि सबको मुक्ति देनी है। अब देवता धर्म है नहीं। उनका ही सैपलिंग लगना है। कोई किस धर्म में, कोई किस धर्म में चले गये हैं। वही निकल पड़ते हैं। यह धर्म की स्थापना कितनी वन्डरफुल है। तब तो कहते हैं हे प्रभु तेरी श्रीमत गति सद्गति की बड़ी वन्डरफुल है, जो कोई समझ न सके। देवी-देवता धर्म की स्थापना कैसे होती है! इतना समय जो पतित देह-अभिमानी बन पड़े हैं, उनके लिए फिर देही-अभिमानी बनना - इसमें मेहनत लगती है। घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। बाबा कहते हैं, उठते बैठते मुझे याद करो। विकर्मो का बोझा तुम्हारे ऊपर बहुत है। सुख भी तुमने बहुत देखा है, दु:ख भी तुमने बहुत देखा है। अब फिर दु:ख से तुमको सुख में ले जा रहा हूँ। तो श्रीमत पर चलना पड़े और फिर औरों को भी याद दिलाते हैं। सृष्टि चक्र का राज़ समझाना बड़ा सहज है। उनको ही त्रिकालदर्शी कहा जाता है।

बाबा ने समझाया है - बोलो भगवान के तो तुम बच्चे हो ना। भगवान है स्वर्ग का रचयिता तो भगवान से जरूर स्वर्ग का वर्सा मिलना चाहिए। यह बात तुम ही जानते हो और तुम ही पूछ सकते हो। कहते हैं ईश्वर ने पैदा किया तो तुम ईश्वर के वारिस होने चाहिए ना! ईश्वर बाप स्वर्ग का रचयिता फिर तुम नर्क में क्यों पड़े हो! यह तो तुम जानते हो हम पहले स्वर्ग में थे। रावण ने हमको नर्क में ढकेला है। रावण क्या चीज़ है, यह भी कोई नहीं जानते। तुम याद दिला सकते हो भारत ही प्राचीन स्वर्ग था और भारतवासी स्वर्ग के मालिक थे। अब ही भारत नर्क बना है। यह खेल बना हुआ है। रामराज्य और रावण राज्य आधा-आधा है। यही खेल है। फिर उनके बीच में क्या होता है, वह भी डिटेल बैठ समझाते हैं। कोई-कोई बच्चे निश्चयबुद्धि हैं जो समझते हैं हम बाप के सामने बैठे हैं। बाबा त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी है, त्रिमूर्ति है, ब्रह्मा विष्णु शंकर का भी रचयिता है। त्रिमूर्ति शिव के बदले त्रिमूर्ति ब्रह्मा का नाम रख दिया है। अब त्रिमूर्ति का रचयिता ब्रह्मा कैसे हो सकता? गाते भी हैं ब्रह्मा द्वारा स्थापना, शंकर द्वारा विनाश तो रचयिता जरूर कोई दूसरा होगा। इतनी छोटी बात को भी कोई समझते नहीं हैं। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग का वर्सा देंगे और क्या देंगे! विष्णुपुरी कौन स्थापन करते हैं? बाप विष्णुपुरी अर्थात् लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन कर रहे हैं, यह भी किसको मालूम नहीं है। विष्णु का अलग चित्र बनाए उनको नर नारायण कहते हैं और लक्ष्मी-नारायण का फिर अलग-अलग बना दिया है। चित्र कैसे वन्डरफुल बना हुआ है।

तुम बच्चों को प्रदर्शनी में समझाना होता है। प्रदर्शनी हो और बच्चे अपने ही धन्धे में लगे रहें तो थोड़ेही समझेंगे कि इसने बाबा को पहचाना है। बाप समझ जाते हैं यह खुद ही पूरा समझा हुआ नहीं है तब तो सर्विस पर नहीं भागते हैं। नहीं तो झट सर्विस पर भागना चाहिए। अन्धों की लाठी न बनें तो गोया खुद ही अन्धे हैं। बाबा को जानते नहीं। किसको कहना थोड़ेही होता है कि तुम सर्विस पर जाओ। आपेही आना चाहिए बाबा हम सर्विस पर जा सकते हैं, आप परमीशन दो। बाबा जानते हैं कौन-कौन सर्विस कर सकते हैं। ऐसा कोई लिखता नहीं है कि बाबा हम रेडी हैं। मनुष्य को कौड़ी से हीरे जैसा बनाना है। अगर 10-20-50 रूपया नहीं कमाया तो क्या हुआ? बहुतों का कल्याण करना है। परन्तु पूरी पहचान नहीं। कोटों में कोई जानते हैं। हमारे पास भी थोड़े बच्चे हैं सर्विसएबुल, जिनको टेलीग्राम करके बुलाना पड़ता है। आपेही नहीं कहते हैं बाबा हम तैयार हैं। बाबा देखते हैं - किसको सर्विस का शौक है। मनुष्य जो जानवर मिसल बन पड़े हैं, उनको देवता बनाना है।

तुम बच्चों को निरहंकारी बनना है। हेड में तो बड़ी नम्रता चाहिए। बाप कितना निरहंकारी है, कोई-कोई बच्चों में बहुत अहंकार है। जैसा कर्म मैं करूँगी मुझे देख और भी करेंगे। उसका दण्ड, उनकी अवस्था गिर पड़ेगी। बाबा कहते हैं बच्चे, तुम्हें सब कुछ अपने हाथ से करना है। बाबा कैसे साधारण रीति से पढ़ाते हैं। मनुष्य तो समझते हैं - वह सर्वशक्तिमान् है, क्या नहीं कर सकते हैं! परन्तु बाबा कहते हैं मुझे तो सर्वेन्ट बनकर आना पड़ता है। कहते भी हैं हे ज्ञान के सागर, पतित-पावन आओ। सुख के सागर आओ, आकर हम पतितों को पावन बनाओ। बाप को आकर ऐसी सर्विस करनी पड़ती है। कहाँ आकर रहना पड़ता है! कैसे-कैसे विघ्न पड़ते हैं। लाखा भवन को आग लगाते थे, सभी प्रैक्टिकल में हो रहा है। बाबा तो सारे पार्ट को जानते हैं, हम नहीं जानते। बाप कहते हैं मुझे आना पड़ता है। भगवान खुद कहते हैं मुझे गाली खानी पड़ती है। सबसे जास्ती गाली मैं ही खाता हूँ। भक्ति मार्ग में भी गाली ही देते हैं। 3 पैर पृथ्वी के भी नहीं मिलते। फिर भी कितना निरहंकारीपने से पार्ट बजा रहे हैं। मम्मा बाबा बच्चों को सिखलाने के लिए सब कुछ करते हैं। कितना नीचे उतरना पड़ता है। पतितों को पावन बनाना है। मूत पलीती कपड़ों को धोना है तो धोबी भी है, सोनार भी है। सबको गला-गला कर सच्चा सोना बनाते हैं। अच्छा !

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।


धारणा के लिए मुख्य सार:

1) बाप समान निरहंकारी, नम्रचित बनना है। अपनी सेवा अपने हाथ से करनी है। किसी भी बात में अहंकार नहीं दिखाना है।

2) सर्विस के लिए सदा तैयार रहना है। सर्विस के लिए स्वयं को आपेही ऑफर करना है। कौड़ी जैसे मनुष्यों को हीरे जैसा बनाने की सेवा करनी है।

वरदान:

अपने देवताई संस्कारों को इमर्ज कर दिव्यता का अनुभव करने वाले व्यर्थ से इनोसेंट, अविद्या स्वरूप भव

जब आप बच्चे अपने सतयुगी राज्य में थे तो व्यर्थ वा माया से इनोसेंट थे इसलिए देवताओं को सेंट वा महान आत्मा कहते हैं। तो अपने वही संस्कार इमर्ज कर, व्यर्थ के अविद्या स्वरूप बनो। समय, श्वास, बोल, कर्म, सबमें व्यर्थ की अविद्या अर्थात् इनोसेंट। जब व्यर्थ की अविद्या होगी तब दिव्यता स्वत: और सहज अनुभव होगी इसलिए यह नहीं सोचो कि पुरूषार्थ तो कर रहे हैं - लेकिन पुरूष बन इस रथ द्वारा कार्य कराओ। एक बार की गलती दुबारा रिपीट न हो।

स्लोगन:

रूहानी गुलाब वह है जो कांटों के बीच में रहते भी न्यारे और प्यारे रहते हैं।



***OM SHANTI***

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