BK Murli Hindi 28 April 2017

Brahma Kumaris Murli Hindi 28 April 2017

28/04/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - इस कलियुग में सब रावण की जंजीरों में बंधे हुए, जीवन-बंध हैं, उन्हें जीवनमुक्त बनाना है”

प्रश्न:

कौन सा वर्सा आप ब्राह्मणों के साथ-साथ सभी मनुष्य आत्माओं को भी मिलता है?

उत्तर:

जीवनमुक्त बनने का वर्सा सभी को मिलता है। तुम ब्रह्मा की औलाद ब्राह्मण बनते हो इसलिए तुम्हें 21 जन्मों के लिए जीवनमुक्ति का वर्सा मिलता है, बाकी सबको अपने-अपने धर्म में पहले-पहले जीवनमुक्ति अर्थात् सुख फिर दु:ख मिलता है। हर एक आधा समय सुख और आधा समय दु:ख भोगते हैं। बाकी हर एक स्वर्ग के सुख नहीं भोग सकते। उसके लिए तो ब्राह्मण बनना पड़े, पाठशाला में शिक्षा लेनी पड़े, माया पर विजयी बनना पड़े।

गीत:-

मुखड़ा देख ले प्राणी......

ओम् शान्ति।

यह किसने कहा? अपने दिल रूपी दर्पण में देखो कि कितने पाप हैं, कितने पुण्य हैं अर्थात् 5 विकारों पर कितनी जीत पहनी है! हम लायक बने हैं श्री नारायण को वरने? क्योंकि जीवनमुक्ति वा स्वर्ग के मालिक तो राजा रानी भी बनते हैं, प्रजा भी बनती है। तो दर्पण में अपने को देखना है कि माँ बाप जितनी सेवा हम कर सकते हैं! यह सिर्फ तुम ब्राह्मण ही जानते हो कि यह कलियुग है और सब जीवनबन्ध में हैं। एक भी जीवनमुक्ति में नहीं है। तुम भी जीवनबन्ध में थे। अभी जीवनमुक्ति पाने के लिए बाप पुरुषार्थ कराते हैं। बाप ने समझाया है - इस समय सब मनुष्य मात्र जीवन-बन्ध में हैं क्योंकि है ही कलियुग। रावण की जंजीरों में बँधे हुए हैं। कलियुग है जीवनबंध। सतयुग है जीवनमुक्त। रामराज्य में यथा राजा रानी तथा प्रजा सब जीवनमुक्त हैं। रावणराज्य में जीवनबंध हैं, यथा राजा रानी तथा प्रजा। इस समय सब मनुष्य मात्र जीवनबंध में हैं, तमोप्रधान दु:खी हैं। अब सबको सतोप्रधान में जाना है। सतोप्रधान शुरू होता है सतयुग में। हर एक आत्मा को अपना-अपना पार्ट बजाना है। आत्मा अपने-अपने धर्म में जब आती है शान्तिधाम से तो पहले-पहले जीवनमुक्त है। सतयुग त्रेता में किसको जीवनबंध नहीं कहेंगे क्योंकि रावणराज्य ही नहीं। कलियुग में रावणराज्य है। सारी पृथ्वी पर जीवनबंध राज्य है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म का पहला नम्बर जो है, वह भी जीवनबंध में है। अब जीवनमुक्त बन रहा है। जीवनमुक्ति का अर्थ यह नहीं कि सभी सतयुग त्रेता में आ जायेंगे। नहीं, रावण के दु:ख से छुड़ाना - उसको ही जीवनमुक्ति कहा जाता है। मनुष्य, मनुष्य को मुक्ति वा जीवनमुक्ति दे नहीं सकते। मुक्ति अर्थात् निर्वाणधाम में सबको बाप ही ले जाते हैं। पहले सब मुक्ति में जायेंगे फिर जीवनमुक्ति में नम्बरवार धर्म अनुसार आयेंगे। ऐसे नहीं कि सतयुग में नहीं आते तो जीवनमुक्त नहीं कहला सकते। पहले-पहले जो भी आते हैं अपने धर्म में, वो जीवनमुक्ति में हैं। आत्मा को पहले सतोप्रधान बनना है, फिर सतो रजो में आना है। 

हर चीज़ नई से पुरानी होती है, पुरानी से फिर नई बनती है। इस समय साधू सन्त आदि सब जीवनबंध में हैं। है ही कलियुग। जब तक बाप न आये। उनको बाबा कहा जाता है, फिर महाकाल कहो या कोई भी नाम रखो। असुल नाम है शिवबाबा। बाबा-बाबा कहते ही रहते हैं। गॉड फादर परमपिता परमात्मा कहते हैं। बाप समझाते हैं मैं आकर बच्चों को मुक्ति जीवनमुक्ति दोनों ही देता हूँ। पहले-पहले जो भी आयेंगे जरूर सुख में आयेंगे, फिर पीछे दु:ख में आना है। मुक्ति के बाद जीवनमुक्ति आती है फिर पीछे है जीवनबंध। पहले-पहले जरूर सुख में आना है। बाप सभी को सुख का वर्सा देते हैं फिर कोई का एक जन्म भी सुख का होगा। आया थोड़ा सुख पाया और मरा। उनका ड्रामा में इतना ही पार्ट है। वृद्धि तो मनुष्यों की होती ही रहती है। अब तक आते ही रहते हैं। जास्ती रहने वाले तो नहीं हैं। विनाश सामने खड़ा है। जो नये आयेंगे फिर भल कलियुग में आयें परन्तु आते ही दु:ख नहीं भोगेंगे। जरूर उनका कहाँ अच्छा ही मान होगा। मुक्तिधाम से हमेशा पहले जीवनमुक्ति में जाना होता है। माया के बन्धन से मुक्त हो पहले सुख में उतरेंगे, फिर दु:ख में आयेंगे। इस समय सब जड़जड़ीभूत अवस्था को पाये हुए हैं। अपना सुख और दु:ख का पार्ट बजाए सब मुक्ति और जीवनमुक्तिधाम में आयेंगे। मुक्ति है ही वाया। जायेंगे फिर आयेंगे जरूर। सारी दुनिया के मनुष्य मात्र जो जिस-जिस धर्म में आये हैं वह फिर ऐसे ही आयेंगे। जनक को भी जीवनमुक्ति मिली ना। ऐसे नहीं कि राजाई इस समय नहीं है। वह भी पिछाड़ी में आकर ज्ञान लेंगे जरूर। जीवनमुक्ति तो तुम सबको मिलती है परन्तु नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। और जो सब धर्म हैं उनके लिए फिर कहेंगे नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार और धर्म अनुसार। जो भी देवी देवता धर्म वाले और-और धर्मो में चले गये हैं वह सब निकल आयेंगे। सबको वापिस आना है। पहले ब्राह्मण बनना है। यूँ ब्रह्मा की औलाद तो सब हैं परन्तु ब्राह्मण सब नहीं बनेंगे। 

जो ब्राह्मण बनते हैं उन्हों के लिए 21जन्म जीवनमुक्त कहा जाता है। राज-गद्दी पर बैठते हैं तो राजयोग सीखना पड़े। यह पाठशाला है। पाठशाला में शिक्षा लेनी पड़े। कायदे भी बहुत हैं, एक बार लक्ष्य मिल गया फिर विलायत में भी रहकर पढ़ सकते हैं। बरोबर हम शिवबाबा के बच्चे हैं। बाप से वर्सा जरूर लेना है। पत्र भी लिखते हैं, बाबा रावण का भूत सताता है। कभी काम का, कभी क्रोध का हल्का नशा आ जाता है। बाप कहते हैं इन पर विजय पानी है। यह तुम्हारी लड़ाई है ही योगबल की। तुम याद करेंगे, माया तुम्हारा बुद्धियोग तोड़ देगी। तो बाबा ने समझाया है, जीवनमुक्ति सबको मिलनी है। इसका मतलब यह नहीं कि सब स्वर्ग में आयेंगे। सभी चाहते हैं हमको मुक्ति चाहिए। समझो जो पिछाड़ी में आते हैं पार्ट बजाने तो बाकी इतना समय मुक्ति में होंगे ना। कितनी शान्ति मिल जाती है। 4500 वर्ष अथवा पौने 5 हजार वर्ष शान्ति में रहते हैं। फिर उनका पार्ट ही ऐसा है। हम फिर सुख और शान्ति दोनों में रहते हैं। ऐसे नहीं कि मनुष्य चाहें बस हमको उन जैसी ही शान्ति चाहिए। वहाँ बैठे ही रहें। कहने से नहीं मिल सकती। अनादि ड्रामा बना हुआ है। इसमें फर्क नहीं पड़ सकता है। शान्ति के शौकीन तो बहुत हैं। तुम्हारे सुख से भी उन्हों को शान्ति ज्यादा मिलती है। तुमको फिर सुख और शान्ति दोनों मिलते हैं। यहाँ सुख है-अल्पकाल का। शान्ति तो यहाँ होती नहीं। दु:खधाम है ना। बाकी जंगल में जाकर बैठ जाना, वह कोई शान्ति थोड़ेही है। अगर वहाँ शान्ति है फिर तो वहाँ ही बैठे रहें, फिर शहर में आकर इतने फ्लैट आदि क्यों बनाते हैं। वहाँ सतयुग में तो शान्ति ही शान्ति है। भल पिछाड़ी में जो आते हैं वह समझते हैं यहाँ अशान्ति ही अशान्ति है। उन्हों को तो शान्ति है, दूसरों को अशान्ति में समझते हैं। यह बातें बड़ी समझने की हैं। जीवनमुक्ति मिलती सबको है। 21 जन्म तुम राज्य करते हो तो दूसरे देरी से आते हैं, वह ऊपर शान्ति में रहते हैं। कोई सतयुग में अथवा त्रेता में पीछे आते हैं तो भी हैं तो शान्तिधाम में ना। वहाँ कोई दु:ख नहीं है। फिर नम्बरवार आयेंगे, हिसाब-किताब भी है ना।

मनुष्य समझते हैं कि साइन्स बड़ी तीखी है, हम कहते हैं हमारी साइलेन्स सबसे तीखी है। बाबा की याद से ही ताकत मिलती है। वह साइंस की ताकत से ऊपर चन्द्रमा में जाने का पुरुषार्थ करते हैं, तुम तो एक सेकेण्ड में सूर्य चांद से भी ऊपर चले जाते हो। मूलवतन, सूक्ष्मवतन से ऊपर तो कुछ है नहीं। सूर्य चांद से मूलवतन, सूक्ष्मवतन बहुत दूर है। किसको मालूम नहीं पड़ सकता। यह हैं सब डिटेल की बातें। सूर्यवंशी राजा रानी बनने की तकदीर नहीं है तो कुछ समझ नहीं सकते हैं, न किसको समझा सकते हैं। कोई ऐसे कह न सकें कि मुक्ति जीवनमुक्ति का ज्ञान मेरे में हैं। (जनक का मिसाल) सभी को जेल में डाल दिया। इस समय रावण ने सबको जेल में डाल दिया है। राम आकर सबको छुड़ाते हैं। बाप द्वारा तुम निमित्त बने हो सबको रावण के चम्बे से छुड़ाकर जीवनमुक्त बनाने के लिए। तुम्हारा नाम बाला है शिव शक्ति सेना। तुम्हारा नाम इस ड्रामा में पिछाड़ी को बहुत ऊंचा होना है। जब से बाप आया है तो माताओं का मर्तबा दुनिया में भी बहुत ऊंचा हुआ है। पहले विलायत में माताओं का मर्तबा बहुत था। वहाँ बच्ची पैदा होती तो बहुत खुशी मनाते हैं, यहाँ बच्ची पैदा होती है तो खटिया उल्टा कर देते हैं। बर्थ डे भी नहीं मनाते। वैसे कन्याओं का कन्हैया गाया हुआ है। वास्तव में तुम सब कन्यायें हो। तुम्हारा यह नया जन्म है। बाकी पढ़ाई में नम्बरवार हैं। आत्मा छोटी बड़ी नहीं होती है। शरीर छोटा बड़ा होता है। कोई झट समझ जाते हैं, किसकी तकदीर में नहीं है तो समझ नहीं सकते हैं। जीवनमुक्ति और जीवनबंध यह दोनों इस स्थूलवतन की ही बात है। सतयुग से लेकर जीवनमुक्त होते हैं। फिर जीवनबंध होते हैं द्वापर में। अभी सुख को सब भूल गये हैं, दु:ख में पड़े हैं। ऐसा कोई है नहीं जो कहे कि हमने 21 जन्म सुख लिया था। अब रावण राज्य होने के कारण मूत पलीती हो गये हैं। वहाँ रावण राज्य ही नहीं तो मूत पलीती कैसे हो सकते हैं। गाया भी जाता है योगबल, भोगबल। वहाँ योगबल से बच्चे पैदा होते हैं। 

तुम रसम को जानते हो। दूसरों की तो बात ही नहीं। अमेरिकन आदि की रसम रिवाज वह जानें। हम अपनी रसम रिवाज को जान गये हैं। हम सतयुग के रहने वाले हैं। वहाँ हमारी रसम रिवाज भी नई होगी, उस पर चलेंगे। जैसे कल्प पहले तुम चले थे। जो हुआ होगा वही अब होगा। बच्चे ध्यान में जाकर रसम-रिवाज देखकर आते हैं। परन्तु फिर भी ऊंच पद पाने का पुरुषार्थ करना है। जिन्होंने वहाँ की रसम-रिवाज बताई, वह सब अभी हैं नहीं। तो इनसे कुछ फायदा तो होता ही नहीं है। तो सारा मदार है पढाई पर। योग और ज्ञान, योग अर्थात् बाप को याद करना। ज्ञान अर्थात् चक्र फिराना। यह तो सहज है। बाप कहते हैं मेरे पास आना है इसलिए मुझे याद करो। मनुष्य को मरने समय कहा जाता है राम-राम कहो। अर्थ कुछ भी समझते नहीं। श्रीकृष्ण कहने से भी वहाँ पहुँच तो नहीं जाते। ले जाने वाला फिर भी बाप है। विकर्म विनाश होने बिगर तुम वापिस कैसे जायेंगे। अभी सबकी कयामत का समय है। फिर अपने-अपने समय पर आयेंगे। यह प्वाइंट धारण करनी है। नोट करनी है।

तुमको मात-पिता को फालो करना चाहिए। मम्मा कभी किसको तंग नहीं करती थी। कईयों की बहुत रिपोर्ट आती है, मैनर्स नहीं हैं। परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं, कितना दिमाग चाहिए। अच्छी चलन वाले पर सभी का प्यार रहेगा। कोई तो बड़ा तंग करते हैं। अपने आपको ही चमाट मारते हैं। तो पद भ्रष्ट हो जायेगा। गाया भी जाता है हिन्दू लोगों ने अपने आपको चमाट मारी है। ईश्वर जो राज्य भाग्य देता है उनको सर्वव्यापी कह दिया है। यह अपने को चमाट मारी है तब यह हाल हुआ है। शास्त्रों में दिखाया है कि भगवान कहते हैं कि मैं सर्वव्यापी हूँ। परन्तु भगवान खुद कहते हैं मैं कोई तुम्हारे जैसा थोड़ेही हूँ जो अपने को चमाट मारूंगा। क्या मैं कुत्ते बिल्ली में हूँ! बाप कहते हैं तुमने मेरी ग्लानि की है - यह भी ड्रामा। फिर भी ऐसे ही होगा। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।


धारणा के लिए मुख्य सार:

1) कोई भी उल्टी चलन नहीं चलनी है। अच्छे गुण धारण करने हैं। मात-पिता को फालो करना है।

2) योगबल से काम, क्रोध के हल्के नशे को भी समाप्त करना है। निमित्त बन सबको रावण की जंजीरों से छुड़ाने की सेवा करनी है।

वरदान:

बेफ़िक्र बादशाह की स्थिति में रह वायुमण्डल पर अपना प्रभाव डालने वाले मास्टर रचयिता भव

जैसे बाप को इतना बड़ा परिवार है फिर भी बेफिक्र बादशाह है, सब कुछ जानते हुए, देखते हुए बेफा। ऐसे फालो फादर करो। वायुमण्डल पर अपना प्रभाव डालो, वायुमण्डल का प्रभाव आपके ऊपर नहीं पड़े क्योंकि वायुमण्डल रचना है और आप मास्टर रचयिता हो। रचता का रचना के ऊपर प्रभाव हो। कोई भी बात आये तो याद करो कि मैं विजयी आत्मा हूँ, इससे सदा बेफिक्र रहेंगे, घबरायेंगे नहीं।

स्लोगन:

प्रसन्नता की छाया द्वारा शीतलता का अनुभव करो तो निर्मल और निर्माण रहेंगे।



***OM SHANTI***

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